'पत्रकारिता' ..एक ऐसा कुलीन पेशा, जिसे कभी समाज में उच्चतम दर्ज़ा प्राप्त था.. समाज का चतुर्थ स्तम्भ , सत्य के प्रहरी , कलम के सिपाही आदि इत्यादि उपनामों से 'पत्रकारों का संबोधन किया जाता था .. लेकिन आज स्थिति बिलकुल उलट है इसके .. आज के समय में उन्ही को 'पीत पत्रकार' , 'सैटिंगबाज़' 'लाईज्नर' आदि की संज्ञाओं से सु-शोभित किया जाता है.. मै इस विषय में ज़्यादा 'ज्ञानबाज़ी' तो नहीं करना चाहता, लेकिन भारतीय पत्रकारिता को इस प्रकार दम तोड़ते हुए देख भी नहीं सकता हूँ, आज ये विषय हम पत्रकारों के लिए 'ग्लोबल वार्मिंग' से भी खतरनाक हो चुका है जो जल्द ही बची-खुची पत्रकारिता को भी डुबो देगा.. इस पर चिंतन और यथासंभव कार्यान्वन निश्चित ही ज़रूरी है.. मेरे निजी विचार से निम्नावार्नित कुछ ऐसे तथ्य हैं जिन पर प्रकाश डाल कर हम पत्रकरिता की इस स्थिति का विचार-मंथन कर सकते हैं.. भारतीय पत्रकरिता को इस स्थिति में पहुँचाने के लिए ज़िम्मेदार निम्न तथ्यों पर कृपया गौर फरमाएं..
१) सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की रेवड़ियाँ : १९९५ के बाद देश में 'इलेक्ट्रोनिक मीडिया साइक्लोन' आ गया था, भारत जैसे देश में मीडिया की बढ़ती ताक़त एवं मीडिया के साथ जुडी जनभावना की खबर नौकरशाहों एवं दिल्ली में बैठे सफेदपोशों को थी, वे अच्छी तरह जानते थे, कि मीडिया किस प्रकार से जनता की भावनाओं के साथ जुड़ गयी है, नेताशाही और नौकरशाही दोनों को इस बात की फिक्र हो चली थी कि यदि मीडिया की शक्ति इसी प्रकार से जन-मन को प्रभावित करती रही तो इसके दुष्प्रभाव उनकी काली मंशाओं पर पड़ सकता है, साथ ही मीडिया का स्वरुप अब इतना बड़ा हो चुका था कि भारत जैसे प्रजातान्त्रिक देश में मीडिया पर पाबन्दी लगाना या कोई नियामक बैठना लगभग असंभव सा ही था.. इसका एक मात्र उपाय इसका स्वरुप बिगाड़ कर और इसकी लोकप्रियता को कम करके अपना उल्लू सीधा करना था .
दिल्ली में बैठे नौकरशाहों ने सामाजिक उदारता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सेटेलाइट खबरिया चैनलों को लाइसेंस बांटने के लिए दोनों हाथों से रेवड़िया बांटनी शुरू कर दी, जिसके परिणामस्वरूप बड़े-बड़े व्यापारी जिनका दूर -दूर तक पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं था, वह भी 'जुगाड़' करके न्यूज़ चैनल खोल कर अपनी दुकान चमकाने लगे.
२) मीडिया का दुष्प्रचार : मीडिया की शक्ति और आम-जन के साथ उसकी भावना को देखते हुए, हर पक्ष चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई उसके माध्यम से अपना राजनितिक उल्लू सीधा करना चाहता था और आज भी है, जिसके परिणाम स्वरुप जन्म हुआ 'पीत-पत्रकरिता' का और मीडिया में घुस आये इन 'व्यापारियों' की चांदी कटने लगी , ये दौर इन 'व्यापारियों' के लिए सबसे सुनहरा दौर था.
और इसी दौरान जिनका उल्लू सीधा नहीं हुआ, उन्होंने मीडिया के ही खिलाफ मोर्चा खोल लिया, और उसको ही बता दिया सम्बंधित पक्ष के साथ मिला हुआ.
इस दौर में शायद ही कोई ऐसा विभाग,समूह, राजनितिक दल, उद्योग, प्रसिद्द व्यक्ति विशेष नहीं होगा जिसको मीडिया ने छुआ न हो या प्रभावित न किया हो. पक्ष में बोला तो ठीक , और यदि पोल खोल दी तो व्यक्ति या समूह विशेष मीडिया का विरोधी बन गया.
इसका परिणाम ये हुआ कि,धीरे -धीरे मीडिया के विरोधी ज़्यादा हो गए हैं और पक्षधर कम क्योंकि ये बात तो जग-ज़ाहिर है.. कि हमाम क्या है और नंगे कितने हैं..? इसका नवीनतम उदाहरण आजतक के दफ्तर पर आर एस एस के कथित हमले को लेकर जब आज तक ने अपनी ही वेब साईट पर जनता की राय मांगी को विपक्षी ज़्यादा निकले और पक्षधर कम.जिससे चैनल की काफी किरकिरी हुई.
३) हमारा सिनेमा : एक चैनल ने जब मीडिया में फैली गन्दगी और सिनेमाजगत के गुरुओं को छेड़ना शुरू किया तो, सिनेमा में भी एक बड़ा गुट इनके विरुद्ध लामबंध हो गया, और जो नहीं हुए वो न इनके पक्ष में थे न विपक्ष में, जिसका सीधा असर हमारे समाज में खासा असर रखने वाले सिनेमा में मीडिया की छवि को लेकर हुआ. नतीजतन, वही भारतीय सिनेमा जिसमे कभी नेता और सरकारी अफसर को घूस लेते हुए दिखाया जाता था, वहीँ मीडिया कर्मियों को उसी कतार में लाकर खड़ा कर दिया गया.
धीरे धीरे हमारी फिल्मों में 'पत्रकार' सच के लिए जान देने वाला नहीं, सच के लिए जान लेने वाला बन गया. महेश भट्ट ने फिल्म 'शो बिज़' तो रामू ने फिल्म 'रण' से अपने नज़रिए से मीडिया को दिखाया.
४) कलम विरुद्ध कैमरा : इलेक्ट्रोनिक मीडिया की लोकप्रियता और झट-पट मसाला चाट जैसी ख़बरों से अखबारों को अपने भविष्य पर ख़तरा मंडराता दिखाई देने लग गया, परिणाम ये हुआ कि एक -दुसरे पर वार-प्रतिवार का दौर शुरू हो गया, सं २००० के आस पास ऐसा महसूस होता था कि दोनों पेशे अब पेशेवर तरीके से एक दुसरे की उधेड़ने में लग गए हैं , चैनल वाले कहते थे अखबार फ़ालतू है और अखबार वाले चैनलों को गालियाँ देते थे, इन सब में मौज में थे नेता और नौकरशाह, वो तो जैसे ऐसा ही चाहते थे, सब कुछ प्रायोजित सा लगता था, इन सब का सीधा असर दोनों ही प्रकार की मीडिया की छवि पर पड़ा.
५) कैमरा विरुद्ध कैमरा : एक दौर ऐसा भी आया जब 'व्यापारियों' और असल पत्रकारों में जंग शुरू हो गयी इलेक्ट्रोनिक मीडिया में, हम सबको बचपन में पढाया जाता था कि लक्ष्मी से ज़्यादा बलवान है सरस्वती, लेकिन वास्तविकता इसके बिलकुल उलट है, इस जंग में जीत हुई लक्ष्मी की ... और 'सरस्वती' के उपासको को कोने में फेंक दिया गया, हर एक चैंनल में एक भूत ऐसा छा गया था जिसने सबको वश में कर लिया था, वह नवजात भूत था 'टी आर पी', जिसके लिए चैनलों ने एक-दुसरे के ही खिलाफ तलवारें निकाल लीं, नतीजतन, जनता के सामने स्थिति हास्यास्पद हो गयी.
और हाँ, 'टी आर पी ' नामक नवजात को हष्ट पुष्ट और बलवान करने में उनके जनकों से कहीं ज़्यादा नौकरशाहों और नेताओं का योगदान है, इस 'टी आर पी' का नेताओं और उनके चमचों ने गला फाड़ -फाड़ कर जनता में प्रचार किया और मीडिया की छवि को धूमिल करके 'कलम' को मरणासन्न कर दिया.
इस लेख को लिखने का मेरा मकसद गड़े मुर्दे उखाड़ना नहीं है, न ही मै कोई 'मीडिया-सुधारक बाबा' हूँ.. प्रजातान्त्रिक देश में रहता हूँ, आरोप लगाने और आरोपों का खंडन करने कि आजादी है मुझे.. एक हालिया पिक्चर का डायलौग सुना था कहीं ' तुने मेरी मारी, अब देख मै तेरी कैसे बजाता हूँ' , तो बंधू , मारने और बजाने की आजादी तो भारत जैसे देश में ही मिल सकती है जहाँ दुनिया में सबसे ज़्यादा लगभग २५० से भी अधिक तो केवल 'न्यूज़ चैनल' हैं, और अखबारों की सख्या तो ठीक से याद नहीं पर वो भी है दुनिया में सबसे ज़्यादा, तो क्या हुआ हमारे यहाँ भ्रष्ट नेता भी सबसे ज़्यादा हुए, अब तो शायद भ्रष्ट मीडिया भी सबसे ज़्यादा....
-आपका अपना
'अज्ञान-गुरु'
प्रशांत गुप्ता
