Wednesday, July 18, 2012

...मैं कल सारी रात..यादें टटोलता रहा ...





मैं कल सारी रात..यादें टटोलता रहा ..

वो पुरानी दराज़ में, कुछ पीले कागजों में..
धुंधले पड़े शब्दों को, खंगोलता रहा ..

मैं कल सारी रात..यादें टटोलता रहा ..

वो एक सौंधी सी खुशबू का ख़त , वो एक सूखा गुलाब का फूल ..
वो हर एक लम्हा उन दिनों का , नज़रों में डोलता रहा ..

मैं कल सारी रात..यादें टटोलता रहा ..

वो कुछ टिकटें कटी फटी सी, वो इक उसके बालों का पिन ..
 वो उसका एक पुराना रुमाल, साँसों में रस घोलता रहा ..

मैं कल सारी रात..यादें टटोलता रहा ..

वो रूठने मनाने के दौर, वो आकर चले जाने का दौर,
वो उसके चले जाने का ग़म , आंसुओं में बोलता रहा ..

मैं कल सारी रात..यादें टटोलता रहा ..

वो घंटों रहना साथ-साथ, वो मीलों चलना साथ-साथ,
आँखों के हर एक आंसू को, पलकों से तौलता रहा ..

मैं कल सारी रात..यादें टटोलता रहा ..

 -  © प्रशांत गुप्ता 

5 :30 A.M. 19/07/2012.