Thursday, April 15, 2010

बुरी नज़र वाले , तू पाकिस्तान चला जा ..



नेशनल हाईवे नं १० से जाते हुए इस ट्रक ने अचानक ही हमारा ध्यान खींच लिया, और मैं अपने मोबाईल से इसकी तस्वीर निकाले बिना नहीं रह सका, अक्सर हाईवे पर ट्रकों के पीछे शेर-ओ- शायरी,जुमले इत्यादि लिखे दिख जाते हैं, लेकिन ये जुमला अपने आप में शायद बहुत कुछ कह रहा है, सारे बुरी नज़र वाले जिनका पहले मुह काला किया जाता था, अब उन्हें पकिस्तान जाने की सलाह दी जा रही है, वही पकिस्तान जहाँ हमारे देश की 'सपूतनी' सानिया मिर्ज़ा ब्याही गयीं हैं,इस ट्रक को हैदराबाद से गुज़ारने की ज़रुरत थी कुछ समय पहले. लेखक के मुताबिक शायद मुह काला करने से भी बड़ी सज़ा पकिस्तान भेजना है. ये जुमला हमारे समाज के उस तपके की सोच को दर्शा रहा है , जो हिन्दुस्तान की सरकारें बनाता और बिगाड़ता है, इस ट्रक को हमारे विदेश एवं गृह मंत्रालय के के सामने से भी गुजरने की आवश्यकता थी , जो बिना दांत के शेर की तरह अपनी मांद में बैठ कर केवल गुर्राता आया है पकिस्तान पर, इन सभी 'बुरी नज़र वालों' को पकिस्तान ही भेज देना चाहिए शायद...


कुल मिला के, इस ट्रक को देख कर मेरे मन में इस तरह के कई सवाल उठ गए और पूरे सफ़र भर मैं यही सोचता रहा , कि कितना सही जुमला लिखा है लिखने वाले ने.. अब आप भी सोचिये कि किसने और क्यूँ लिखा ऐसा जुमला..


- प्रशांत गुप्ता

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Wednesday, April 14, 2010

एक लड़ाई अपनों से ...



लन्दन निवासी प्रवासी भारतीय शिराज़ अन्दानी, गुजरात उच्च न्यायालय के तरफ से आये फैसले से बहुत हर्षित हैं, शिराज़ अन्दानी के खिलाफ स्थानीय पुलिस में उनको प्रताड़ित करने हेतु विभिन्न अपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए थे, लेकिन गुजरात उच्च न्यायालय के हाल ही में आये फैसले ने उनके विरोधियों पर लगाम लगा दी है.



शिराज़ अन्दानी जो की लन्दन निवासी प्रवासी भारतीय हैं और लन्दन में प्राथमिक विद्यालय का सञ्चालन करते हैं एवं मुस्लिम 'खोजा' समुदाय से ताल्लुक रखते हैं , इनके पूर्वज रोज़ी-रोटी कमाने हेतु १९४० में प्रवासी हो गए थे, सं 2001 कच्छ में आई भयानक भूकंपीय त्रासदी में , जब वे कच्छ में आये तो अपने मूल ग्राम में शिक्षा , चिकित्सा एवं मूलभूत सुविधाओं के अभाव को देख कर अत्यंत व्यथित हो गए, तभी उन्होंने मन बनाया की अपनी गाँव के विकास के लिए वह अवश्य कुछ न कुछ ज़रूर करेंगे, इसके बाद वह भविष्य की योजनाओं पर काम करने लगे, इन्ही प्रयासों के चलते वह कई बार भारत अपने गाँव आये, २००७ में स्थानीय निवासियों एवं भारत में अपने अन्य रिश्तेदारों की मदद से उन्होंने स्थानीय ग्राम वासियों को शैक्षिक ट्रस्ट बनाने के लिए उत्साहित किया, क्यूंकि भारतीय ट्रस्ट नियमों के चलते वह स्वयं भारत में ट्रस्ट नहीं बना सकते थे, स्थानीय निवासियों को ट्रस्टी बना कर, गुजरात प्रदेश शैक्षिक बोर्ड से मान्यता हेतु आवेदन कर दिया,



शिराज़ के इस सु-प्रयास को देख कर जहाँ स्थानीय लोगों ने बहुत सहयोग किया वहीँ पर कुछ स्थानीय लोग इर्ष्या एवं द्वेषभाव के चलते इनके विरोधी बन गए, गाँव के ही दुसरे गुट ने इनका मुखर विरोध करना शुरु कर दिया ..उन्होंने गाँव के लोगों को यह कह कर भड़काना चालू कर दिया कि, शिराज़ मुस्लिम हैं और गाँव में मदरसा खोलना चाहते है, गाँव के ही एक दबंग व्यक्ति एवं उनके साथी जो कि अपने निजी लाभ हेतु स्कूल खोलना चाहते थे, उन लोगों ने भी गुजरात माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में हाई स्कूल स्थापना के लिये आवेदन कर दिया, इसके साथ ही शिराज़ को गाँव छोड़ने की धमकियाँ दी जाने लगी,लेकिन शिराज़ अपने दादा के सपने को पूरा करने के लिए अडिग रहे. प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारीयों जब दोनों ही आवेदन कर्ताओं के विद्यालय का निरिक्षण किया, तो वे शिराज़ द्वारा स्थापित स्कूल के सुविधाओं जैसे मुफ्त शिक्षा, स्वच्छ पानी,कंप्यूटर एवं खेल-कूद हेतु तमाम सामग्री इत्यादी को देख कर अत्यंत प्रभवित हो गए और शिराज़ को स्कूल चलने की अनुमति दे दी गयी , जिसके फलस्वरूप इनके विरोधी गुट को मुह की खानी पड़ी.



इस घटना के बाद तो जैसे शिराज़ के बाद एक-के-बाद एक मुसीबतों का अम्बार लग गया, उनके ऊपर ट्रस्ट के मनोनीत सदस्य बनाने के लिए गए दस्तावेजों को फर्जी बता कर अनेक अपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए, शिराज़ ने फिर भी मुक्काद्द्मों एवं प्रताडनाओं की परवाह न करते हुए , गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक से गुहार लगाई,लेकिन मदद तो दूर आश्वासन भी नहीं मिला. हताश निराश शिराज़ ने फिर भारतीय न्याय व्यस्था का सहारा लेते हुए, गुजरात उच्च न्यायालय में अपने खिलाफ झूठे मुक्काद्मों और प्रताडनाओं के विषय में एक याचिका दायर की.



गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अनंत एस दवे ने शिराज़ पर लगे सारे आरोपों को निराधार बताते हुए उनके विरुद्ध दर्ज मुक्काद्द्मों पर अग्रिम आदेश तक रोक लगा दी. इस पर उत्साहित शिराज़ कहते हैं ' शुरुआत में मैं काफी हताश हो गया था, मुझे लगता था मेरा अपना पुश्तैनी गाँव जिसके लोग मेरे अपने ही हैं, उन्ही से मुझे उनकी भलाई के लिए लड़ना पड़ रहा है, लेकिन न्यायालय के फैसले ने मेरा अपने देश की न्याय व्यस्था पर विश्वास अब और बढ़ा दिया है, इस फैसले से मेरी तरह उन सभी प्रवासी भारतियों को साहस मिलेगा जो अपने देश के लिए कुछ करना तो चाहते हैं लेकिन स्थानीय राजनीतियों के कारण या तो कर नहीं पाते या फिर हार कर बैठ जाते है, मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूँ, इतना सब कुछ होने के बाद भी मुझे मेरे विरोधियों से कोई रोष नहीं है, मैं जानता हूँ के वे मेरे उद्देश्यों को समझेंगे और अपने गाँव के विकास में मेरा हाथ बटायेंगे, मैं चाहता हूँ कि, क्यूँ नहीं मेरे अपने गाँव से भी कोई 'श्याम पित्रोदा' बने और हमारे गाँव और देश का नाम रौशन करे"



शिराज़ ने हमें विद्यालय देखने के लिए आमंत्रित किया, बाहर से विद्यालय आम विद्यालयों के तरह ही लगा, लेकिन जब हम अन्दर गए तो इतनी छोटे से गाँव में इतनी सुविधाओं वाला विद्यालय देख हमें थोड़ा आश्चर्य हुआ, बच्चों से बात किया तो पता चला, इस छोटी सी आबादी वाला गाँव जिसकी ७० प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, उस गाँव के बच्चों ने हमसे 'अंग्रेजी' में बात करी, जो कि विन्डोज़ के नवीन संकरण से सु-सज्जित कप्युटरों पर काम करते हैं. साफ़ कक्षाएं और प्रसाधन, एक बेसबाल और वौलिबौल कोर्ट भी देखने को मिला. अद्ध्यापक एवं अद्ध्यापिकाएं भी प्रशिक्षित लगे.



शिराज़ द्वारा प्रेरित एवं गठित 'अन्दानी फाऊँडेशन ट्रस्ट' कि भविष्य कि योजनाओं में, 'वंडिया' गाँव में चिकित्सा एवं सामाजिक उत्थान हेतु विब्भिन्न योजनायें चलाने की है, जिनकी रूप रेखा तैयार की जा चुकी है.


- प्रशांत गुप्ता

+91-9925143545

Wednesday, April 7, 2010

मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी ..


मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी .. मैं कौन हूँ, अबला नारी सी..

मैं कौन हूँ , जिसने जन्म दिया तुम सबको को अपने आँचल में..

मैं कौन हूँ, जिसने सींचा है तुमको हरपल में I

मैं कौन हो जिसको नहीं पता, बच्चे उसके गोरे है या काले है..

मैं कौन हूँ जिसको नहीं पता कितने मेरे पाँव में छाले हैं I

मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी .. मैं कौन हूँ, अबला नारी सी..

मैं कौन हूँ, जो नहीं है सोती रातों को,

मैं कौन हूँ, जो देती है छतरी, रूकती चलती बरसातों को I

मैं कौन हूँ, जो देती है रोटी , अपने हर भूखे बच्चे को ..

मैं कौन हूँ, जिसने प्यार दिया हर झूठे या फिर सच्चे को I

मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी .. मैं कौन हूँ, अबला नारी सी..

मैं कौन हूँ , जो डर जाती है, अपने बच्चों से कभी कभी..

मैं कौन हूँ , जो रो जाती है , अपने बचों से कभी कभी I

मैं कौन हूँ, जो अपने बच्चों को देख-देख मुस्काती है,

मैं कौन हूँ, जो हर छोटे धमाकों से डर जाती है I

मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी .. मैं कौन हूँ, अबला नारी सी..

मैं कौन हूँ, जिसका की कोई धर्म नहीं,

मैं कौन हूँ , जिसके बच्चों में शर्म नहीं I

मैं कौन हूँ, जिसके बच्चे, खुद मेरे लिए ही लड़ते हैं,

मैं कौन हूँ जिसके बच्चे, भाषा,क्षेत्र पर मरते है..

मैं माँ हूँ ,हर उस बच्चे की जो मेरे आँचल में सोता है,

मैं माँ हूँ , हर उस बच्चे की जो भूख से व्याकुल रोता है.

कुछ मान करो कुछ शर्म करो मुझ बेबस अबला माँ की भी,

ज़रा फिक्र करो ज़रा सोचो तो , हर जाती हुई जान की भी..

मैं कौन हूँ? मैं तो माँ हूँ ..मैं 'मुंबई' हूँ..





-प्रशांत गुप्ता

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वो छोटी छोटी बातों पर...


वो छोटी छोटी बातों पर , झट से लड़ जाना याद है क्या..
वो लम्बी लम्बी मांगो को, रो कर मनवाना याद है क्या..

वो उड़ाना ऊंची पतंगों को, फिर भागना मीलों पकड़ने को..
वो मेरे सारे कंचों को , लेकर गुम जाना याद है क्या.

वो छोटी छोटी....


वो हर सुबह पेट दर्द , रोना और चिल्लाना ,
वो हर दिन नया बहाना, मम्मी को सुनाना याद है क्या..

वो छोटी छोटी..


वो करना झगड़ा दोस्तों से , वो मारना पत्थर शीशों पे,
वो आना लोगों का घर पर, झट से छुप जाना याद है क्या ..


वो छोटी छोटी..

वो चुपके से साइकिल ले जाना, गिर गिर कर भी चलाना
वो बाजू वाले के डोर बेल को, बजा कर छुप जाना याद है क्या .

वो छोटी छोटी बातों पर , झट से लड़ जाना याद है क्या..
वो लम्बी लम्बी मांगो को, रो कर मनवाना याद है क्या..



-प्रशांत गुप्ता

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जीवन में यूँ ही कभी-कभी..


जीवन मैं यूँही कभी कभी , कुछ ऐसे पल भी आते हैं,
होकर विचलित हम सपनो में, बैठे बैठे खो जाते हैं...

मन निष्चल सा निर्जीवन सा , क्षीण क्षीण हो जाता है.
कुछ उजली-धुंधली यादों मैं , न जाने क्यूँ खो जाता है..

क्यूँकर मन रिझ जाता है, फिर से उन तृष्णाओं में?
खुशबु क्यूँ आने लगती है , तुम्हारी, इन हवाओं में...

शब्दों के तक्षक बंधन में, जीवन भला बंधा है कभी,
दिशाहीन धनुर्धर से , कोई तीर भला सधा है कभी ?

क्या पाया था इस जीवन में, जो सोच सोच मन रोता है,
पाने खोने की मृगतृष्णा में, फिर क्यूँ व्यथित तू होता है..

अंतहीन आकाश से जैसे, पक्षी प्रतियोग सा करता है,
स्व्यम्जनित अहम से मन, वैसे ही प्रयोग सा करता है...

जीवन की इस धरा में, बहते रहना ही जाना है,
जो बीत गया वो बीत गया, न सोच समय गंवाना है...

चलते चलते हर राह में पथिक, कांटे कंकड़ तो आयेंगे,
हर घाव जो देंगे अपने, तुम्हे, चलते-चलते भर जायेंगे...

ज्यौं रुक गया मैं थक हार कर, अंतर भी मेरा मर जाएगा,
रुक-रुक कर विचरित करने से, जीना नश्वर हो जाएगा...!


- प्रशांत गुप्ता

+91-9925143545