Thursday, March 14, 2013

.....फिर से मुझको बहला दो माँ.....





फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..

वो कल कल बहते झरने , वो ची ची करती चिड़ियाँ,

वो झिलमिल करते तारों को , आँचल में फिर छुपला दो माँ 

फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..


वो सौंधी-सौंधी मिटटी का घर , वो खट्टी-खट्टी अमिया के पेड़,

वो मीठी मीठी बेरों को , फिर से ज़रा खिला दो माँ ,

फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..


वो तीखी-तीखी 'लाला' की टिकिया, वो सतरंगी बर्फी 'अब्दुल' की,

वो उलझे-उलझे बुड्ढी के बाल, फिर से ज़रा सुलझा दो माँ ..

फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..


दिखलादो माँ फिर से वो दुनिया,जब घर छोटा दिल बड़ा होता था ,

लगती जब थी चोट किसी 'राम' को , दर्द 'रहीम' को होता था।

फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..



-प्रशांत गुप्ता