Thursday, March 14, 2013

.....फिर से मुझको बहला दो माँ.....





फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..

वो कल कल बहते झरने , वो ची ची करती चिड़ियाँ,

वो झिलमिल करते तारों को , आँचल में फिर छुपला दो माँ 

फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..


वो सौंधी-सौंधी मिटटी का घर , वो खट्टी-खट्टी अमिया के पेड़,

वो मीठी मीठी बेरों को , फिर से ज़रा खिला दो माँ ,

फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..


वो तीखी-तीखी 'लाला' की टिकिया, वो सतरंगी बर्फी 'अब्दुल' की,

वो उलझे-उलझे बुड्ढी के बाल, फिर से ज़रा सुलझा दो माँ ..

फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..


दिखलादो माँ फिर से वो दुनिया,जब घर छोटा दिल बड़ा होता था ,

लगती जब थी चोट किसी 'राम' को , दर्द 'रहीम' को होता था।

फिर से मुझको बहला दो माँ, वो दुनिया फिर दिखला दो माँ..



-प्रशांत गुप्ता 

7 comments:

  1. Iss "Ram" "Raheem" ki uljhan se
    Tum aaj mujhe suljha do maa....
    Koi fark nahi do beto main
    Yeh sabak inhen sikhla do maa...!!

    Phir se mujhko bahla do maa..
    voh duniya fir dikhla do maa..!!

    V v touchy Prashant ji... Thnks a lot for d wonderful wordings

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  2. बहुत सुंदर शब्द प्रशांत जी....और उतनी ही सरल भावनाएं... बड़े होने के साथ साथ हम कितना कुछ पीछे छोड़ते जाते हैं,, जो छोटे छोटे पल खुशियाँ दे सकते हैं, उन्हें अनदेखा कर, पता नही किन व्यर्थ की चीज़ों में जीवन काट देते हैं..
    आपके अन्दर कही छिपे एक बच्चे ने लिखी है ये कविता...उसे ऐसे ही हमेशा जिलाए रखियेगा....

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  3. bhai ye konsa roop h aap ka..

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  4. bhai ye konsa roop h??????????

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  5. its jus 10 on 10.. prashant ji.. u have a long way to go.. many many blessings n love

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