Wednesday, April 7, 2010

जीवन में यूँ ही कभी-कभी..


जीवन मैं यूँही कभी कभी , कुछ ऐसे पल भी आते हैं,
होकर विचलित हम सपनो में, बैठे बैठे खो जाते हैं...

मन निष्चल सा निर्जीवन सा , क्षीण क्षीण हो जाता है.
कुछ उजली-धुंधली यादों मैं , न जाने क्यूँ खो जाता है..

क्यूँकर मन रिझ जाता है, फिर से उन तृष्णाओं में?
खुशबु क्यूँ आने लगती है , तुम्हारी, इन हवाओं में...

शब्दों के तक्षक बंधन में, जीवन भला बंधा है कभी,
दिशाहीन धनुर्धर से , कोई तीर भला सधा है कभी ?

क्या पाया था इस जीवन में, जो सोच सोच मन रोता है,
पाने खोने की मृगतृष्णा में, फिर क्यूँ व्यथित तू होता है..

अंतहीन आकाश से जैसे, पक्षी प्रतियोग सा करता है,
स्व्यम्जनित अहम से मन, वैसे ही प्रयोग सा करता है...

जीवन की इस धरा में, बहते रहना ही जाना है,
जो बीत गया वो बीत गया, न सोच समय गंवाना है...

चलते चलते हर राह में पथिक, कांटे कंकड़ तो आयेंगे,
हर घाव जो देंगे अपने, तुम्हे, चलते-चलते भर जायेंगे...

ज्यौं रुक गया मैं थक हार कर, अंतर भी मेरा मर जाएगा,
रुक-रुक कर विचरित करने से, जीना नश्वर हो जाएगा...!


- प्रशांत गुप्ता

+91-9925143545

2 comments:

  1. jeevan ke sach ko shabdon me bhaut hi khubsurati se likha hai

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    1. धन्यवाद, मानसी जी..

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