Friday, June 4, 2010

सेक्स स्टिंग ऑपरेशन ( न्यूज़ , न्यौता या प्रचार ?)


न्यूज़ चैंनलों की गलाकाट टीआरपी प्रतिस्पर्धा का एक और नया उदाहरण सामने आ रहा है.. समाज में तथाकथित 'सनसनी' फ़ैलाने वाले प्रोग्रामों का स्तर आजकल इतना गिर चुका है की, वे पत्रकारिता की सारी सीमाएं भूल चुकें हैं.. टी आर पी हासिल करने के लिए जब इनके पास कोई खबर नहीं होती है तो निर्देश आता है कि दो-चार 'दलालों' या मसाज पार्लरों का नंबर निकालो अखबार या इन्टरनेट से, और कर डालो एक 'सनसनीखेज़ स्टिंग ऑपरेशन'.. रात को १० बजे के बाद टेलीकास्ट होते, इस तरेह के कार्यक्रमों को एक 'विशेष' दर्शक वर्ग देखता भी बड़े चटखारे लेकर है I धुंधले किये गए चेहरों में शायद लोग पहचानने की कोशिश करते है की शायद कहीं दिख जाये ये लड़की..तो बस ! वहीँ दूसरी ओर बीवी-बच्चों के साथ बैठे हुए 'ज़हीन' दर्शक ऐसी रिपोर्ट आते ही रिमोट ढूंढने लगते हैं ! बातचीत और 'देख-दाख' करने के बात ये पत्रकार न्यूज़ रूम चले आते है एडिटिंग के लिए, कार्यक्रम में भी कथित 'सेक्स के अड्डों ' का लोकेशन वगैरेह बता कर, 'सनसनीखेज' तरीके से कार्यक्रम समाप्त भी हो जाता है I मैं एक बात इनसे पूछना चाहूँगा की इस तरह के 'खुलासों' के पीछे आखिर इनकी मंशा क्या होती है? इस तरह के 'मसाज पार्लरों' एवं 'जिस्मफरोशी के अड्डों' का खुलासा करने के बाद क्या उनको स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना देकर, इन अड्डों को बंद नहीं कराना चाहिए? इस प्रकार से तो इनका राष्ट्रीय चैंनलों पर फ्री फ़ोकट में विज्ञापन हो जाता है, इस तरह के धंधों में लिप्त लोग आजकल तो 'मीडिया प्रूफ' हो गए हैं..अब उन्हें कैमरे का कोई खौफ़ नहीं है, खुले आम अब तो वेबसाइट पर नंबर दिए जाते हैं (जो पहले ई-मेल पते होते थे).

टी आर पी के लिए जिस तरह से पहले INDIA टीवी ११ के बाद पाठकों की अन्तरंग समस्याओं पर चर्चा करता था, अब उसी का रूप १० बजे वाले क्राइम प्रोग्रामों ने ले लिया है.. बीते दिनों मध्य प्रदेश के एक जलसे पर अश्लील नृत्य कि टी आर पी खूब बटोरी गयी थी चैनलों पर.. लेकिन अश्लीलता को अश्लील तरीके से दिखाना क्या अश्लीलता नहीं है? इस तरह कि अश्लीलता से प्रिंट एवं ई मीडिया कोई अछूता नहीं है.. वेब ख़बरों के माध्यम से दुनिया भर को दुनिया भर कि ख़बरें फ्री में दिखाती ख़बरिया वेब साइटें तो आज कल अश्लीलता कि सारी सीमाएं लांघ गयीं हैं, और कमाल की बात ये है की इन वेब साइटों पर कोई लगाम लगाने वाला भी नहीं नहीं है..ज़रा गौर फ़रमायें...http://photogallery.navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5998575.cms?show_recent

मेरा केवल यह सवाल है की अगर मीडिया प्रेस की स्वतंत्रता की बात करता है , तो क्या इस तरह की स्वतंत्रता से समाज का भला होने वाला है? स्व-नियंत्रण संस्था बनने के इतने वर्षो बाद भी कोई असर होता नहीं दिखता है, तो क्यों न हमारे भारत में भी पडोसी देश चीन की तरह ही मीडिया रेगुलेटर बैठा दिया जाये? मै स्वयं एक पत्रकार होने के नाते ये कह रहा हूँ, क्योंकि अब मुझे ऐसा लगता है की इस रोग को रोकने के साथ ही इसको फैलाने वाले 'मरीजों' को भी रोकना होगा. तभी शायद हमारे समाज के चतुर्थ स्तम्भ फिर से समाज को एक मज़बूत आधार दे पायेगा..

-प्रशांत गुप्ता

आपकी अच्छी/बुरी प्रतिक्रिया अवश्य दें..

1 comment:

  1. आपका बताया उपाय इस समस्या के लिए कुछ सार्थक लगता है |

    ReplyDelete