Thursday, June 24, 2010
कुछ मेरे बारे में...
किसी ने कहा है कि, "अगर आपमें लिखने की कला है, मगर इतनी नहीं कि उपन्यास लिख सकें.. और जिरह करने की क्षमता है लेकिन इतनी नहीं कि वकील बन सकें..तो आप 'पत्रकार' ज़रूर बन सकते हैं.." शायद इसी कारण से मैं भी 'पत्रकार' बन गया..
जन्म एवं शुरूआती पढाई उत्तर प्रदेश के 'कानपुर' जिले में हुई, कानपुर जो की कभी अपनी कपड़ा मिलों के लिए जाना जाता था, लेकिन अब शायद 'अपराध' एवं 'मज़हबी-दंगों' के लिए 'विश्व-कुख्यात' है..
बचपन से ही स्कूल की किताबों को छोड़ कर, कोई भी किताब पढने का शौक था..कॉमिक्स,चम्पक,चंदामामा और जब कुछ नहीं मिला तो 'अटरिया' वाले शिवमंगल भैया की उपन्यास ही चाट जाया करता था.. और हाँ, रोज़ सुबह का अखबार तो दिनचर्या का हिस्सा था ही..
मोहल्ले और आस-पास में घटते लड़ाई-झगडे,घरेलु फसाद राजनितिक जोड़-तोड़ की तो अघोषित 'डिग्री' अपने आप ही मिल गयी थी हमें.. चाचा वकील थे तो फूफा नेता, इन्ही सब को देखते समझते बचपन जैसे तैसे बीत ही गया..
'कन्फ्युज' मैं बचपन से रहा थोड़ा, बचपन में जब कोई पूछता था की बेटा बड़े होकर क्या बनोगे ? तो मैं सोचता था कि, मै कोई ज्योतिष हूँ क्या? ?जो इत्ती सी उम्र में दस-बीस साल का भविष्य बता दूंगा ..फिर जब माताजी ने डांटा की 'देखो पपुआ कैसे बोलता है सबसे.. डॉक्टर बनेगा..वैसे तुम भी तो कुछ बोलो' फिर बहुत 'कन्फ्यूजन' के बाद मैंने 'इंजिनियर' कहना चालु कर दिया, परिणामस्वरूप सबकी शाबाशी और प्लेट पर रक्खा लड्डू मिलने लगा..
पढाई में ज़रा रूचि कम थी अपनी ,लेकिन जैसे तैसे खींच-खांच के 'फर्स्ट डिविज़न' ले ही आये दसवी बोर्ड में.. लेकिन फिर थोड़े 'कन्फ्युज' हो गए की आगे 'साइंस' चला पाएंगे की नहीं..अंत में थोड़ी हलकी 'कॉमर्स' ले ली..सोचा की चलो थोडा कम बोझ होगा दिमाग पर..
अपनी इसी 'कन्फ्यूजन' के चलते हमने नौकरियां भी बहुत करीं, या फिर ये कहें तो लग भाग सारी ही कर डालीं.. पहले 'पेजर कंपनी' का 'पेजर' बेचा, फिर घर-घर जाके 'सफाई वाली मशीन' फिर किसी दोस्त ने चढ़ाया कि 'तुम्हारी आवाज़ बहुत अच्छी है', तो चले गए 'रेडियो' के लिए विज्ञापन बनाने वाली कंपनी में ऑडिशन देने..किस्मत से हमें ले भी लिया गया..फिर कुछ दिनों बाद दुसरे दोस्तों को देख कर 'कॉल सेंटर' की रंगीनियों की तरफ आकृष्ट हो गए, कुछ दिन बाद फिर मुझे लगा की मै तो पत्रकारिता के लिए ही पैदा हुआ हूँ तो शुरू कर दिया ढेर सारे हिंदी पेपरों में 'पाठकीय' लिखना, 'राष्ट्रीय सहारा' के संपादक एवं मेरे गुरु श्री संजीव मिश्र ने 'सहारा' दिया तो 'सहारा' के लिए 'अनाधिकारिक' 'मुक्त- पत्रकारिता' करने लगा..
'इलेक्ट्रोनिक-मीडिया' से भी तभी जुड़ा, काफी पन्ने भरे मैंने उस दौरान.. लगभग एक वर्ष तक 'क्रांति' करने के बाद जब जोश ठंडा हुआ तो देखा अब तो जितना कमाया था सब खर्चा हो गया इस 'क्रांति' में..फिर बैंक की नौकरी के लिए आवेदन कर दिया..
गरीब के भाग्यवश बैंक ने भी नौकरी दे दी, लेकिन भारत के दुसरे छोर 'गुजरात के कच्छ' में..सौभाग्यवश कुछ स्थानीय रिश्तेदारों ने साहस दिया तो यहाँ आ गया..और लगभग छह वर्षों तक जमके नौकरी की..फिर यहीं पर अपने पारवारिक व्यवसाय में आ गया..
कहतें हैं कि, लिखने और पत्रकारिता का 'कीड़ा' कभी मरता नहीं है, वर्षों बाद फिर जागा और मैं वापस पत्रकारिता में आ गया..लेकिन सं २००० की पत्रकारिता से अब की स्थिति बहुत बदल चुकी है.. अब कलम की वो 'औकात' नहीं, जो कभी हुआ करती थी..काफी कुछ बदल चुका है अब..
क्रांति.कॉम नामक एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ , शायद अपने अंतर्मन के लिए.. जो की आज की 'पत्रकारिता' से दोस्ताना नहीं है .. या फिर 'काबिल' नहीं है ..इसको मैं आजकल की पत्रकारिता को गरियाने से कहीं बेहतर समझता हूँ..क्योंकि मेरी समझ में किसी को भी गरियाने से अच्छा है, उससे दूर से निकल जाना और उसका विकल्प तलाशना..
मुझे लगता है शायद मेरा 'कन्फ्यूजन' का 'शैतान' मर गया है अब..
-प्रशांत गुप्ता .
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अपने बारे में अप-धारणाएं न पालें , आप अच्छा लिखते हैं | आप का लेखन समकालीन विषयों के बारे में लोगों को वो सत्य दृष्टी देता है जिससे वो हीन हैं |
ReplyDeleteमेरी दृष्टी में आप एक अनुभवी कार्यकर्ता और भक्त श्रेणी के व्यापारी हैं |
आप जैसे राष्ट्रप्रेमी लोगों की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होगी |
mera maanna hai ki humara bachpan humare badon ke hath me hota hai wo hume sahi disha dikha sakte hain.par khud apne liye sahi disha chun kar us par chalna jada mushkil hota hai , jo aapne kar dikhaya hai, jo ho chuka , usse bhi jada jaruri hai ki aap aaj khud ko pahchaan paaye hain aur aap bhaut accha likhte hain , ye aapki ek acchi aur sachi soch ko batata hai.
ReplyDeletenice...........
ReplyDeletejo log naye raaste talashte hai unki sabki kahani kuch aisi hi hoti hai... Baagi, beparwahi aur zindagi ko kadam kadam par chunauti dene ki zid... aakarshit kiya aapki lekhni ne... shubh kamnaye..
ReplyDeleteconfused aap itne hain k achey bhale ko bhi confuse kar dein,, lekin aap hain jabardast klakaar aur baaki sab hai bekaar..
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