मई- जून की चिलचिलाती और खाल को कचोटती हुई गर्मी.. कानों को फाड़ता हुआ गाड़ियों का शोर , जो कभी धीमा होता तो कभी कान के अन्दर घुस कर, दिमाग को झनझना देता I नथुनों में घुसता हुआ पेट्रोल और डीज़ल का मिश्रित धुआं I
शहर की दौड़ती- भागती इस सड़क के दूसरी ओर एक २६-२७ साल का औसत कद-काठी का युवक, जो सड़क के इस पार आने के लिए कभी कदम बढाता तो कभी दनदनाती हुई टैम्पो और बस के डर से फिर पीछे खींच लेता I सफ़ेद शर्ट, जोकि नील लगाने की वजह से, सफ़ेद थी या नीली ? इसका फैसला करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है I कमर पे टंगी काले रंग की पैंट जो सुबह -सुबह के काले आकाश की तरह सफ़ेद रंग में घुलती सी जान पड़ रही थी I बहुत जद्दोजहद करने के बाद आखिर वो शख्स मौत को चकमा देकर सड़क के इस पार आ ही जाता है I
भट्टी की तरह तपती सड़क ...तपिश को और बढ़ाती गर्म और धूल भरी हवा I युवक सड़क के इस पार आकर साइन बोर्ड के नीचे की थोड़ी छाँव में अपने आप को ढकने की कोशिश में लग जाता है, लेकिन सर पे रखे सूरज की वजह से सर का कुछ हिस्सा ही ढक पाता है I थोड़ी सांस लेने के बाद फिर उसकी आँखों में वही हलचल नाचने लगती है, और सड़क के दाहिनी और न जाने किसको खोजता हुआ ? नज़रें दौड़ाने लगता है I
आइये हम इस युवक के अंतर्मन से ही इसकी कहानी को जानने की कोशिश करते हैं...
अभी तक नहीं आई १२ नंबर? कहीं निकल तो नहीं होगी ? बड़ी मुश्किल से आज विनय जी ने टाइम दिया है .. कपडे तो सही हैं..दाहिने जूते की सिलाई थोड़ी सी खुल गयी है, लेकिन थोड़ा अंगूठा दबा के चल लूँगा .. लेकिन आज विनय जी को इम्प्रेस कर देना है बस किसी तरह.. फाइल में सारी रिपोर्टें हैं की नहीं ? 'दैनिक' में पाठक कोने में छापे सारी कटिंग हैं की नहीं? फिर से चेक कर लेता हूँ ज़रा ..
तभी तूफ़ान की तरह पीली सफ़ेद पुती हुई बस जोकि एक तरफ से झुकी होने की वजह से अपंग सी जान पड़ रही थी, दनदनाते हुए सड़क पे आ धमकी, ठसा ठस भरी हुयी I एक खिड़की से पांच-पांच लोगों के सर ऐसे झाँक रहे थे जैसे मुर्गी के दड़बे में मुर्गियां ठूंस दी जाती हैं I आगे और पीछे हैंडिल पर लोग सावन के झूलों की तरह झूल रहे थे I मैंने दया प्रार्थी नज़रों से हैंडीलों पे झूलते लोगों की तरफ देख कर नज़रों ही नज़रों में जगह देने की गुहार लगाई, लेकिन सबके चेहरे ऐसे कठोर हो गए जैसे किसी राजा से उसकी सत्ता मांग ली गयी हो, अंत में, मरता क्या न करता किसी तरह से बस के हैंडिल के एक सिरा तो मेरे हाथ आ ही गया, बस ने भी गति पकड़ ली, कुछ सेकंड हवा में झूलने के बाद मैंने पैर भी जमा लिए .. अहहहा.. बस के चलने के साथ ही माथे और भौवों पे जमा हुआ पसीना ठंडा सा महसूस होने लगा, थोड़ा थोड़ा बहते हुए होटों पे आ गया और नमक चखा गया I
बस में खड़े होने के साथ ही साथ मुझे कमर में घुसी फाइल की भी रह-रह कर चिंता हो रही थी I हाथ से तो टोह नहीं सकता था, इसलिए अपनी कमर को मेरे पीछे लदे व्यक्ति को हल्का रगड़ के टोहा, पता नहीं मेरी इस हरकत का उस व्यक्ति को क्या सन्देश गया होगा? लेकिन इन सबकी फिकर कहाँ थी मुझे आज ... मन में मिश्रित भावनाएं हिलोरें मार रही थीं..थोड़ा सा डर, थोड़ा-थोड़ा रोमांच , थोड़ी सी अनजानी सी ख़ुशी और कहीं कोने में घुसा हुआ आत्मविश्वास . लेकिन कुछ भी हो .. मुझे आज तो अपनी लेखन और पत्रकारिक क्षमता से विनय मिश्रा जी को तो इम्प्रेस कर देना है, दुबे जी से फोन तो करा दिया था I दुबे जी ने तो बोला ही था "अरे यार मिश्रा तो मेरा चेला है चेला .. मै एक बार कह दूँ न तो कुर्सी से उठे न वो.., तुम बस जाना और कहना, मुझे सरसइयां वाले दुबे जी ने भेजा है, फिर देखना " I
फ़ोन पे तो बड़े ही नम्र तरीके से बात करी थी विनय जी ने .. आज तो काम बन ही जायेगा, फिर मैं दिखा दूंगा मोहल्ले के सारे लड़कों को, जो मुझे कमज़ोर और बेबस समझते हैं, शरीर से नहीं तो क्या हुआ ..? मै अपने आप को कलम से बलवान करूँगा, जब सबको पता चलेगा कि मैं शहर के सबसे बड़े अखबार का 'रिपोर्टर' बन गया हूँ, तो सब मुझसे इज्ज़त से पेश आयंगे I मालिक मकान जो हर बार किराया न बढ़ाने पर माँ को मकान खाली करने की धमकी देता रहता है और आये दिन उसका बेटा अपने दोस्तों को बुला कर ऊपर जो हमारे घर की तरफ ताका करता है ,उसका भी मुंह चुप हो जायेगा I बहन को कॉलेज के लिए बस पकड़ने के लिए चौराहे पर छोड़ने के समय लोग जैसे मुझे और बहन को घूरते हैं, फिर मैं भी उनको जमके घूर दिया करूँगा..
पिताजी अगर आज होते तो मैंने ये सेल्समैन की नौकरी न करके 'जर्नालिस्म' की पढाई कर ली होती, फिर शायद किसी बड़े मीडिया संस्थान में लग जाता I लेकिन २४ नंबर वाले पप्पू ने तो कुछ भी नहीं किया था .. हाई स्कूल में तो मेरे साथ ही था , फेल होने के बाद उसके विधायक पिताजी ने उसको कहीं बाहर भेज दिया,२-३ साल बाद आया तो बोला कि "बाहर से इंटर करके आया हूँ," घिस -पिट के बी. ए. निकाला था उसने, लेकिन उसके पिताजी ने 'सेटिंग ' करके उसको चैनल में लगवा दिया है, आज तो निकल पड़ी है उसकी, दिन भर ओबी में घूमा करता है, बड़े-बड़े पुलिस वालों और नेताओं के साथ उठना बैठना है उसका आज-कल . . काश मै भी ...!
"बड़ी सड़क बड़ी सड़क"..., अचानक इस तीखी सी आवाज़ ने मुझे सपनों की दुनिया से बहार ला पटका, और मुझे ध्यान आया यहीं तो है 'दैनिक ' का ऑफिस.. पैरों को हवा में झुला कर दौड़ने लगा , ज़मीन छूते ही पैर भी दौड़ने लगे .. बहुत तेजी से पैर चलाने के बाद भी मैं बस को हरा नहीं पाया और दोनों हाथ छूट गए.. लड़खड़ाते हुए घिसट सा गया सड़क पर..जल्दी से उठ कर कमर में लगी फाइल को ढूंडा .. शुक्र है , वो वहीँ जमीं थी. दोनों हाथों की हथेलियों में से उगते सूरज की लालिमा जैसे अन्दर की खाल बाहर झांकने लगी थी, मैंने दोनों हाथों को अपनी कमर में रगड़ के साफ़ किया और फाइल को निकाल कर आगे की तरफ चल पड़ा I
कुछ दूर चलने के बाद मेरी मंज़िल आ गयी.. शहर के सबसे बड़े अखबार 'दैनिक' का ऑफिस .. बड़ा सा काला गेट, बाहर खड़े सिक्यूरिटी गार्ड, गेट के किनारे डब्बे से दिखने वाला सिक्यूरिटी गार्ड का चैंबर. "किस्से मिलना है ?" "जी, विनय मिश्रा जी से" "आपको बुलाया है?" "जी हाँ, आज २:३० का समय दिया था " "आज तो प्रेस के मालिक लोग आये हुए हैं,आज का टाइम दिया है आपको?" "जी आप इंटरकॉम पे बात करके पूछ लें , मैं विनायकपुर से आया हूँ, इंतज़ार कर लूँगा अगर अभी फ्री नहीं हुए हैं तो" "ठीक है, पूछता हूँ , आप ज़रा खिड़की से किनारे हो कर खड़े हो जाइए , बात होते ही आपको बुला लिया जायेगा", "जी सर" .
थोड़ी-थोड़ी सी धड़कन तेज़ होने लगी थी शायद, सोच रहा था कि आज मुलाकात हो पायेगी या नहीं? मै बार-बार सिक्युरिटी वाले की नज़रों में आने की कोशिश करता रहता था, जिससे उसको याद रहे कि मैं खड़ा हूँ यहाँ..लगभग २ घंटे खड़े होने के बाद जब मैं वापस खिड़की में झाँकने गया तो वो सिक्युरिटी वाला गायब था और कोई और आ बैठा था उसकी सीट पर.."सर मै वो, विनय मिश्रा जी से मिलना था" , "साहब को मैसेज दिया आपने ?" "जी हाँ,आपसे पहले जो 'सर' थे, उन्होंने बोला था वेट करने को" "ठीक है मै देखता हूँ" इतना कह कर वो सामने रखे ढेर में न जाने क्या ढूँढने लग गया, अब तो बहुत गला सूख रहा था मेरा, सामने पान की चलती फिरती दुकान जिसके पहियों को देख के लगता था कि सदियों से ये चलती फिरती दुकान यहीं पर स्थायी हो गयी है , एक बहुत मोटे से पेट वाला एक व्यक्ति घुसा हुआ बैठा था, जैसे किसी भूसे के ढेर में हाथी घुस गया हो..
"भईय्या पानी है क्या पीने वाला, थोड़ा सा?" " हाँ-हाँ भईय्या बिलकुल, ये लो" कहकर उसने स्टील का एक लोटा मेरी तरफ बढ़ा दिया, किनारों के अन्दर कत्था छुपा जा रहा था .. मैंने तुरंत ही पूरा लोटा खली कर डाला.. आह्हा.. पानी ठंडा था, गले से होते हुए भूख और गर्मी से जलते हुए पेट तक ठंडक पहुंचा दी उसने."क्या हुआ भैया? बहुत देर से किसी का इन्तजार कर रहे हो?" पान वाले ने पुछा. "हाँ भाई, विनय मिश्रा जी से मिलना था, लेकिन पता चला कि आज प्रेस के मालिक आये हुए हैं इसलिए मिश्रा जी व्यस्त हैं", "अरे वो तो आके कबके चले गए ? चलो कोई बात नहीं, आठ बजे वाले हैं, मिश्रा जी घर पे जाये के पहले हमारा पान ज़रूर खाते हैं, यहीं मिल लेना थोड़ी देर में", इतना सुनते ही मन में फिर से कई सवाल चलने लगे, ऐसे खड़े होके क्या बात करूँगा ? कैसे करूँगा? पता नहीं बात ठीक से करेंगे कि नहीं?
फिर सोचा जो होगा देखा जायेगा आज, लगभग साल तो होने को आया 'दैनिक ' के लिए पाठकीय भेजते -भेजते , सैकड़ों तो पोस्टकार्ड लिख डाले संपादक के नाम, आज जो भी हो मिल के ही रहूँगा. मन में इष्टदेव कम नाम लिया और दरवाजे की तरफ टक-टकी लगाये देखने लगा. थोड़ी ही देर बाद बड़ा गेट खुला और आगे से चपटी हुयी कार, शायद 'सिएलो' रही होगी, गेट से निकली और एक तरफ जाकर सड़क किनारे रुक गयी, उल्टा ट्रैफिक होने की वजह से शायद कार यहाँ तक नहीं आई. कार में से लगभग ४०-४५ की उम्र का पैंट-शर्ट पहने हुए औसत कद का व्यक्ति निकल के दुकान की तरफ आने के लिए सड़क के दोनों ओर झाँकने लगा I
"यही तो हैं मिश्रा जी , चिंता न करो यहीं आ रहें हैं" मै तुरंत जेब में रखे रुमाल को ढूंडने लगा, चेहरे पर पसरी घबराहट को समेटने के लिए,वो व्यक्ति, जिसके लिखे लेख और सम्पादकीय मेरी दिनचर्या का हिस्सा थे..मेरे लिए आदर्श...जो स्वयं मेरे लिए श्री कृष्ण के सामान थे और उनकी लेखनी 'सुदर्शनचक्र' .. वो 'आदर्श' आज मेरे सामने है ..मेरी हृदयगति बढ़ने लगी.. कुछ कदम का फासला चल के वह दुकान पर आ कर खड़े हो गए, एक बार जब नज़रें मिली तो मैंने चेहरे पर कृत्रिम मुस्कान रखकर गर्दन को थोड़ा नीचे की तरफ लचका दिया, जवाब में उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं दिखा. " आइये साहब, ये लीजिये आपके पैकेट, दो बनारसी और एक मीठा गुलकंद वाला" "अभी बनाये हो न ?" "क्या साहेब, कभी आपको लगा है कि बासी दिए हों ? जो आज देंगे? अच्छा साहब ये अजयकुमार हैं आपसे मिलने के लिए आये हैं, दू घंटा से इन्तेजार कर रहे हैं, हम कहे साहब से एहिना मिल लीजियेगा, हमरे पान के बिना थोडेही जाते हैं साहेब घर?
"जी बताएं.." यह कह कर वह मेरी तरफ मुड़े .. " सर मेरा नाम अजय है , मेरी आपसे फ़ोन पे परसों बात हुयी थी , आपने आज २:३० का समय दिया था,मै सर समय से आ गया था लेकिन आपके यहाँ शायद कोई बड़े सर लोग आये थे , इसलिए मैंने यहीं पर प्रतीक्षा करना उचित समझा" मैंने एक सांस में सब उगल दिया .. लेकिन शायद मुझे लगा कि, मै कुछ भूल गया .. हाँ , दुबे जी का नाम तो बोला ही नहीं .. इससे पहले मैं कुछ और बोलता, वो बोले " लेकिन किसलिए मिलना चाहते थे आप ?" " वो सर..मै सर.. सर मुझे वो दुबे जी ने भेजा था .. उन्होंने आपसे बात की थी " "कौन दुबे जी ?" " जी, वो दुबे जी जिनका रामबाग में 'शहर जाग्रति प्रेस' है ..सरसैयाँ वाले " "मुझे कुछ याद नहीं आ रहा है , खैर आप मिलने का उद्देश्य बताएं" " सर मै एक पत्रकार हूँ , आपके अखबार से एक स्ट्रिंगर की तरह जुड़ना चाहता हूँ , मेरे लेख लगभग हर पाठकीय में 'दैनिक' में छपते हैं .." "अभी फ़िलहाल किसके साथ जुड़े हैं आप?" " जी सर, मैंने कई पत्रिकाओं में अनेकों आर्टिकल भेजे हैं , 'शहर जाग्रति' और 'डूबता सूरज' में मेरे ये लेख छपे हैं सर, और मेरे पास अभी बहुत कुछ खोजी रिपोर्ट हैं " ये कहके मैंने फाइल को खोल के आगे बढ़ाया.. "ठीक है , आप के पास अभी कुछ है ?" "जी सर ये है , ये मैंने ३ महीने में तैयार की है , सर ये नगर पालिका में फैले भ्रष्टाचार को लेकर है, फोटो भी है सर इसमें, बड़ा खुलासा होगा सर" "ठीक है , दे दीजिये , मै देखता हूँ, आपका नंबर है कोई ? " "जी सर , लिखा है नीचे , बगल का ही है, बात हो जाएगी " "ओके , मैं बताता हूँ आपको " इतना कह कर वो मुड़ गए और सड़क पार करने के लिए दोनों तरफ ताकने लगे. मेरे दिल की धड़कन अपने चरम पर थी, पेट में हवा चक्कर मार रही थी, भूख -प्यास सबका एहसास मर चुका था , वो पान वाला तो ऐसा लग रहा था कि स्वयं भगवान ने नीचे उतर कर मेरी मदद करी हो, हाथ जोड़ कर धन्यवाद् किया उस पानवाले को, सोचा पैर छु लूँ , थोड़ा आगे भी बढ़ा लेकिन फिर संकोच कर गया. और तेज़ कदमों से बड़ी सड़क की तरफ बढ़ने लगा I
मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने शायद विश्वविजय कर ली हो , नख से शिख तक आत्मविश्वास से सराबोर, मन-ही-मन मुस्कुराता कब मैं बस पकड़ के अपने मोहल्ले के चौराहे पर उतर गया पता ही नहीं चला? लाईट नहीं आ रही थी पूरे एरिया में , सब लोग घर के बाहर थे अधिकतर , बनवारी की दुकान पर रोज़ की तरह मजमा लगा हुआ था, मैं हमेशा से इस दुकान के पीछे की गली से घर जाता था , जिससे मोहल्ले के लड़कों का सामना नहीं करना पड़े, जो अक्सर मेरा मजाक उड़ाया करते थे.लेकिन आज मै जान-बूझ के बनवारी की दुकान पर गया."क्या हुआ अज्जू कहाँ से जंग लड़ के आ रहे हो?" "कहीं नहीं , बस बड़ी सड़क गया था " "बड़ी सड़क? इतनी दूर? क्या काम आ गया तुम्हारा ??" "कुछ नहीं बस ऐसे ही , वो विनय मिश्राजी ने बुलाया था " "विनय मिश्रा, दैनिक वाले? तुम्हे किसलिए बुलाया था ? दैनिक में पोछा मारने?" इतना कह के, दुकान वाले बनवारी को छोड़ कर, सभी लोग हंसने लगे ..मै आगे बढ़ गया , पीछे से आवाज फिर से सुनाई दी "पोछा ठीक से मारा की नहीं ?" मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, मन कर रहा था इन सबको जवाब दे दूँ , लेकिन फिर मैंने अपने मन को समझाया .. इन लोगों को तो समय दिखायेगा , जब मै 'दैनिक' का पत्रकार बन जाऊंगा तो ये सब भी मेरे आगे -पीछे घूमेंगे . तब इन्हें इनकी औकात दिखाऊंगा. सोचते -सोचते घर की सीढियां चढ़ गया I
खाना सामने होते हुए भी खाना खाने का मन नहीं कर रहा था, पूरा घटनाक्रम मेरी आखों के सामने बार-बार घूम रहा था,मैं सोचे जा रहा था कि शायद नमस्कार की जगह 'हेलो सर' कह के हाथ मिलाया होता तो ..? विनय जी मेरा आर्टिकल अभी पढ़ रहे होंगे या खाना कहने के बाद पढेंगे ? या फिर हो सकता है कि उन्होंने पढ़ लिए हो और उनको इतना पसंद आया हो कि वो अभी मेरे पी. पी. नंबर पर फ़ोन मिला रहें हों? सोच कर मैं उठने लगा तो माँ ने टोका " खाना तो खा लो , सुबह से न जाने कहाँ घूम रहे हो ? खाना खाके ही कहीं जाना" जैसे तैसे जल्दी -जल्दी खाना खाके , मैं मेरे पास वाले दत्ता अंकल के यहाँ जाने के लिए भागा. पूरे मोहल्ले में लाईट नहीं आ रही थी. दत्ता अंकल के गेट से मैंने उचक कर अन्दर झाँका तो कोई दिखा नहीं.. मैंने इतनी रात को दरवाजा खटखटाना उचित नहीं समझा, और बाहर ही गेट के पास ये सोच के खड़ा हो गया कि, शायद फ़ोन आये तो आंटी को मुझे बुलाने के लिए दूर न जाना पड़े , या हो सकता है रात के कारण वो मना ही कर दें.? इसी कश्मकश में, कब रात का १ बज गया? पता ही नहीं चला ..चौकीदार ने मुझे टोका "क्या अजय भाई , इतनी रात में , यहाँ?" "कुछ नहीं, काम से आया था , जा रहा हूँ" कहकर में अपने घर की ओर चल दिया, पूरी रात सोचते -सोचते बीत गयी I
सुबह उठ के सबसे पहले 'दैनिक' देखा.. शायद मेरी खबर छप गयी हो , लेकिन पूरे पेपर में कहीं नहीं मिली, सोचा, शायद अब फ़ोन आएगा , अब आएगा , इसी चक्कर में काम पर न जाके, दत्ता आंटी की सेवा में लग गया , दत्ता आंटी ने घर के सिलेंडर से लेकर सारी सब्जियां मंगा डालीं मुझसे, लेकिन आज मैं उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानने वाला था. पूरा दिन बीत गया अपने मन को दिलासा देते -देते, लेकिन फ़ोन नहीं आया I
दो दिन बीत जाने के बाद जब फ़ोन नहीं आया तो मेरे सब्र का बाँध टूट गया , पूजा की अलमारी रखा चिल्लर उठा कर पीसीओ पहुँच गया, "हेलो दैनिक? मिश्रा जी से बात कराइए , विनय मिश्रा जी से " "आप कौन?" "जी मैं , अजय कुमार बोल रहा हूँ विनायकपुर से " फ़ोन पर मधुर धुन सुनाई देने लगी , और मैं मन-ही-मन सेकेण्ड गिनने लगा.."हेलो," "मिश्राजी , मै अजय कुमार बोल रहा हूँ , विनायकपुर से , आपसे मिला था सर , पान की दुकान पे , वो सर मैंने लेख दिए थे आपको कुछ , सर वो छपे नहीं सर , शायद भूल गए थे आप?" " हेलो -हेलो, एक मिनट रुको भाई , वो तुम्हारे लेख नहीं छप सकते, काफी कमियां हैं उसमे" "क्या कमियां हैं सर ? मैंने तो सारी फोटोएं भी दी थी ? " "फोटो साफ़ नहीं हैं और कई कमियां हैं, कुछ और दूसरा भेजना देखता हूँ, और ये वापस चाहिए तो लेकर जाना गेट पर गार्ड से ".. इसके बाद कर टू-टू की आवाज सुनाई देने लगी , मुझे लगा कि इतनी जल्दी फ़ोन कैसे कट गया? मै पी सी ओ वाले पर गरजा "ओ भैया , ये इतना जल्दी कैसे कट गया , ९० सेकण्ड का कॉल होता है , हमें पता है " "अरे भाई कटा नहीं है ,उधर से रख दिया गया है फ़ोन" इतना सुन कर मेरी आखों के सामने अँधेरा सा छा गया, समझ में नहीं आ रहा था क्या करूँ? सीधे घर आ गया वापस और विचारों में खो गया , आँख कब लग गयी पता ही नहीं चला.
दुसरे दिन से मैंने अपने मन को फिर समझाया , चलो अबकी बार कोई ऐसी सनसनीखेज खबर ढूँढ के निकालूँगा कि विनय जी क्या.. शहर के सारे अखबार और इलेक्ट्रौनिक मीडिया के संपादक मुझे ही ढूँढेंगे. इसी सोच के साथ मैं अपनी 'सेल्समैन' की नौकरी करने के साथ-साथ शहर के ज्वलंत और कब्रनशीं मुद्दों को ढूँढने में लग गया I
रविवार की सुबह, मैं आज थोड़ा देर से उठा , रात को लौटते हुए देर हो गयी थी. रसोई से कुछ बनने की ख़ुशबू आ रही थी, बहन पूजा कर रही थी, कमरे में धुआं-धुआं सा फैला हुआ था. मै उठा, और आदतन सीधे घर के छज्जे की तरफ अखबार उठाने के लिए चल पड़ा, ओस से आज अखबार थोड़ा गीला सा हो रखा था, सो मैंने बाथरूम में जाने से पहले पंखे के नीचे अखबार सूखने के लिए रख दिया I
नहा-धो के निकलने के बाद, जब मेरी नज़र अखबार पर पड़ी तो मेरी धडकनें बढ़ गयीं, मेरी दी गयी खबर की फोटो थी ये तो.. मैंने आनन्-फानन में पन्ने पलटने शुरू कर दिए , ये तो मेरी ही खबर थी.. मगर इसका पहला पन्ना कहाँ हैं जहाँ पर मेरा नाम छपा होगा ? मै चिल्लाया "पेपर का पहला पन्ना कहाँ है? " "अरे वो नीचे वाले गुप्ताजी लेकर चले गए हैं , कोई बड़ी खबर है कह रहे थे" मैं भागा , "गुप्ताजी , वो पेपर दीजिये न , मेरी रिपोर्ट छपी है आज , लाइए दिखता हूँ " " तुम्हारी रिपोर्ट ? कहाँ छपी है? 'दैनिक वालों ने बहुत बड़ा खुलासा किया है , इसलिए मै 'दैनिक ' लाया पढने के लिए" ये कह कर उन्होंने मुझे पेपर थमा दिया I
पेपर देखते ही मेरे पैरों तले ज़मीन निकल गयी.. मै जड़वत हो गया वहीँ-के-वहीँ , कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था , आखिर विनय जी ऐसा क्यूँ किया ? क्या होता अगर वो मेरा नाम छाप देते इस खबर के साथ ? उनका क्या चला जाता अगर मेरी खबर को मेरा ही नाम दे देते ?? वो तो हमेशा ही अपने लेखों में नैतिकता एवं सार्थक पत्रकारिता की बातें करते हैं .. अभी पिछले ही संपादकीय में उन्होंने ये कहा था कि पत्रकार तो समाज एवं एवं सत्य का प्रहरी होता है.. वास्तविक पत्रकार वो होता है जिसके लिए अपने देश और समाज के प्रति जूनून और जस्बा होता है.फिर क्यूँ वो अपने ही शब्दों से फिर गए ? वो तो मेरे आदर्श थे .. तो फिर क्या अंतर हुआ अवसरवादी नेताओं और संपादकों में ?
मेरे आत्मसम्मान और वजूद की लड़ाई में मैं हार चुका था अब, पेपर को हाथ में लेकर घर की सीढियां चढ़ता जा रहा था, आँखों से बहता हुआ नमकीन पानी फिर से होठों को खारा कर रहा था, आज पता नहीं क्यूँ अच्छा लग रहा था ये नमक... आदत सी जो पड़ चुकी थी .....
-Prashant Gupta
www.krantee.com

नमस्ते भाईजी
ReplyDeleteबड़ी ही जानदार रचना लिखी है |
यह तो निश्चित ही है की बड़े लोग अव्वल दर्जे के क्रूर व्यवसाई होते हैं किन्तु नैतिकता और आदर्शों की बातों का गाना गाने वाले भी ऐसे ही होते हैं जानकार बड़ा ही दुःख हुआ | मन में कुंठा भर जाती है की ऐसे लोग जो सच में हमारे बल एवं प्रयासों के हक़दार होते हैं समाज में आपके नायक पात्र के सामान धोखे हे पाते रह जाते हैं | ईश्वर परमपिता का न्याय विचित्र एवं बुद्धि से न जाना जा सकने वाला प्रतीत होने लगता है |
भगवान् हमें सदबुद्धि दे एवं निर्दयता, क्रूरता आदि महापातक दोषों से बचाए चाहे तो हमें लोकिक संसार में कोई भी प्रगति न मिले किन्तु हमारा ह्रदय निर्मल एवं निष्कपट बना रहे |
ओ३म् शम ||
very nice prashant ji ,
ReplyDeletezabardasttttttttttttt
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
ReplyDeleteहो कहीं भी आग मगर आग जलनी चाहिए.
आपका लेख पढ़ कर वाकई अच्छा लगा, जैसे एक ताजा हवा का झोंका, जो बदबू में रहने से हुई अभ्यस्तता को तोड़ कर नथुनों में शुद्ध वायु का संचार करता है !!! कुछ पंक्तियों में बयां करना चाहूँगा अपना धन्यवाद...
क्रांति एक नाम है एहसास का जो मर गया,
ये है वो एहसास जिसपर कलम चलनी चाहिए...
लिखते रहें, स्वस्थ रहें, जीवन एक चक्र है, लिख कर फाड़ देंगे टाइप विज्ञापन की पंक्तियाँ कलम की ताकत को इस घोर व्यवसायिक समाज में भी एक अनोखी ताकत के होने का भोकाल तो देती हे हैं...फिर कलम उसी के हाथ में सजाती है जिस के सर पर सकारात्मक लिखने का जूनून हो, और ईश्वर की कृपा से अब तो माध्यम भी है...लिखे हुए को सही हाथों तक पहुँचाना का...यही है नए मीडिया की ताकत !!
आप सभी की बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं ले लिए धन्यवाद , ये लेख आधारित है, हमारे आस -पास मौजूद अनेकोनेक अजय,विजय ,सुधीर या फिर किसी और पर .. जो हर वक्त अपने हालातों और समाज से लड़ते रहते हैं.. ऐसे लोग जो अपनी कमजोरी और परिस्थितियों को हराना चाहते हैं .. उनमें काबिलियत तो कूट -कूट कर भरी होती है , लेकिन कोई सहारा न होने की वजह से सिस्टम के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो जाते हैं..
ReplyDeleteएक 'स्ट्रिंगर' नाम का जीव जो अपने पूरे जीवन काल में केवल अपनी पहचान के लिए ही संघर्ष करता रहता है, पहले अपने समाज में फिर सम्बंधित अखबार या मीडिया हॉउस में.. संपादकों का रवैय्या और काम करने का तरीका भी छुपा नहीं है किसीसे, सफ़ेद कागज के पीछे का काला सच आज छुपा नहीं है किसी से ..ये कहानी आजकालिक मीडिया के 'सिस्टम' पर एक छोटा सा प्रहार है ..
I donno ,who are you bt really sir....now u have a respective position in my heart.You just drawn a real figure of indain journalism industry.Where your talent is worthless but your SETTING and JUGAAD really matters.I hope i will get more reality from your blog.
ReplyDeleteGood Luck for your future.
With Reagrds,
Ratnendra K Pandey
plz inform me about ur nxt blog via email..
my e mail is - ranu4790@gmail.com
एक ऐसी सच्चाई
ReplyDeleteजो खारी नहीं
सदा कड़वी रहती है
और कड़वा वही होता है
जो सच होता है।
एक सच यह भी है कि हिन्दी के टिप्पणी मार्ग में आने वाली अंग्रेजी शब्दों की बाधा को मिटा दीजिए, इसके लिए डेशबोर्ड की सैटिंग में जाकर, कमेंट में वर्ड वेरीफिकेशन को डिसेबल अथवा निष्क्रिय कर दीजिए और कर दीजिए सेव। फिर टिप्पणी रूप फल अच्छे लगेंगे।
बहुत अच्छे ....क्या लिखा है आपने...बिलकुल मज़ा आ गया....आज पत्रकारों की जो सच में हालत है...वो इस रचना में साफ़ साफ़ दिखाई देती है...चाहे वो विनय जैसा ऊँचा पत्रकार हो या...अजय जैसा एक नोकरी की तलाश करता ईमानदार और भोला सा पत्रकार...
ReplyDeleteबहुत अच्छे....आपको मेरी शुभकामनाएँ.....
मोहक शर्मा.......
यह देश का दुर्भाग्य है कि आज प्रतिभा को सम्मान नहीं, गलत कार्यों को सम्मान मिलता है.ईश्वर आपकी मनोकामना पूर्ण करे और आप सार्थक दिशा में वैचारिक क्रांति लाने का प्रयत्न करें.
ReplyDeletehi..prashant sir...aapki ye story mere dil ko chu gay.....excellent story i ever read in recent time..aapki ye kahani hame "woh torti phathar" poem ki yad dila di....
ReplyDeletehi.prashant sir....and thank you..aapki ye story mere dil ko chu gayi....excellent story....kya aap apni kuch aur kahani ka nam bata sakte hai..mughe aapki story me ek saccha pyar aur kranti ki ummid nazar aati...aap ka article kon si newspaper ya magzine me chapta hai..please tell me .i want to read them all..once more thank you.for your lovely story....
ReplyDeleteBahut jaldi me padhi, lekin vaakai achhi rachna hai, aise hilikhte rahen. Bhagwan aapki kalam ko aur taakat pradaan kare, aisi meri shubhkaamna hai. Aage bhi links bhejte rehne ke aagrah ke saath.
ReplyDeleteDil ko chu lene waala sach. i wish ki aap aage bhi aise hi krantee laate rahe apne kalam se.
ReplyDeletevery nice and true...yahi hota hai...
ReplyDelete