Tuesday, October 26, 2010

शर्म से कहो तुम 'पत्रकार' हो !!


इनसे मिलिए, ये हैं 'अजय श्रीवास्तव' 'एबीसी चैनल' से , यह कहकर मेरे मित्र ने एक सार्वजनिक समारोह में मेरा एक समूह से परिचय कराया,वह समूह, जो हम दोनों के पहुँचने से पहले हंसी और ठहाकों से गूँज रहा था , मेरे परिचय के दो शब्द सुनकर सबके चेहरों पर न जाने कैसे भाव आ गए , मैंने एक हलकी सी कृत्रिम मुस्कान और दिखावटी आत्मविश्वास के साथ हाथ बढ़ाया, सामने वाले ने भी बिना किसी भाव के मेरा हाथ बड़ी उदासीनता से छु लिया, मानों ज़बरदस्ती औपचारिकता निभानी पड़ गयी हो, बाकि लोग मुझे चिड़ियाघर से आये किसी अपरिचित जानवर की तरह ऊपर से नीचे तक घूरने लगे. "अच्छा , तो आप एबीसी चैनल में हैं ? पत्रकार हैं ..? भाई बुरा न मानियेगा लेकिन मैंने तो ये सारे हिंदी न्यूज़ चैनल देखना ही छोड़ दिया है , क्या वाहियात ख़बरें दिखाते रहते हैं .. आखरी दिन दुनिया का..भागो आई लाल मौत .. मेरे बच्चे तो डर ही जाते थे ! भाई मैंने तो अब श्रीमती जी के सीरियल्स देखना शुरू कर दिया है , कम से कम वो लोग शुरू होने से पहले ये तो बता देते हैं की इस कहानी के सारे पात्र काल्पनिक हैं और इनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है " तभी दूसरे सज्जन जिनके हाथों में कोई रंगीन पेय था , जिसकी रंगीनियत उनके चेहरे पर भी झलक रही थी , बोले " अरे यार ये साले सब बिके हुए हैं #@#*+=# , मेरा बस चले तो गोली ही मार दूँ सबको , भाई आप बुरा न मानियेगा आप तो नौकरी करते हैं , ख़बरें दिखाना तो दिल्ली वालों का काम है " एक के बाद एक सबने, अपने -अपने तरीके से न्यूज़ चैनलों को जी भर कर कोसा, मै वहां  खड़ा-खड़ा ज़बरदस्ती बस खींसे निपोर रहा था उनके साथ , और ये भी सोच रहा था की ये संजीव ने भी कहा लाकर शराबियों के बीच में फंसा दिया? कैसे खिसकुं यहाँ से ? फ़ोन हाथ में था , कान में लगा कर निकल लिया धीरे से, सबके ये दर्शा के कि कोई फ़ोन आ गया है , मन में आया कि तुरंत निकल भागूं..फिर सोचा खाना तो खा लूँ , आज तो टिफिन वाले को भी मना कर दिया है, और फिर संजीव कॉलेज का दोस्त है , बहन की शादी से ऐसे गया तो बुरा मान जायेगा, लेकिन सच कहूँ तो खाने का सोच के ही रुका मैं उस दावत में.

जैसे तैसे एक कोना पकड़ के थोड़ी देर फ़ोन पर बात करने का नाटक करता रहा , संजीव अभी भी वही खड़ा हुआ था उन लोगों के साथ, शायद मेरी वकालत कर रहा था, वो लोग भी सहमती की मुद्रा में से दिख रहे थे, मैंने बारातियों के साथ भीड़ में गुम होना ही मुनासिब समझा, खाना - वाना खाके जब में वह से निकला तो मन में विचारों की आंधी सी कौंध रही थी , बहुत ही निम्न महसूस कर रहा था मैं आज, सोच रहा था कि क्यूँ आया ऐसे पेशे में? पिताजी की बात अब शायद सही दिख रही थी, कॉम्पटीशन की तैय्यारी कर ली होती तो आज शायद गुड्डू भैया की तरह मै भी इंफोसिस या विप्रो जैसे किसी कंपनी में ९ से ५ की इज्ज़तदार नौकरी कर रहा होता लेकिन मुझे तो कल्पनाओं में उड़ना ही ज़्यादा पसंद था, सिनेमा देखना शुरू से ही बहुत पसंद था मुझे, ये वह सिनेमा ही तो था जिसने मुझे आई आई टी की कोचिंग से विमुक्त करके , मेरे अन्दर के क्रांतिकारी को जगा दिया था, कुछ बहुत बड़ा करने का जूनून और फिर सबको 'हनक' दिखाने का 'कीड़ा' जाग गया था..मुझे पता नहीं क्यूँ हमेशा से ऐसा लगता था मै 'आम' नहीं 'ख़ास' ज़िन्दगी जीने के लिए बना हूँ, सबसे अलग दिखने की , कुछ अलग करने की चाह हमेशा से ही थी मुझमें.. और सबसे आसान कैरियर मुझे 'पत्रकारिता' ही लगा जिसमें ज़्यादा पढने-लिखने की माथामारी नहीं होती, केवल 'ज्ञानबाज़ी' से ही दुकान चलती है, और इज्ज़त मिलती है सबसे ज़्यादा , मोहल्ले ,दोस्तों और रिश्तेदारों में 'हनक' अलग से.

लेकिन अब परिस्थतियाँ वैसी नहीं हैं , अधिकांश युवावर्ग जोकि दिल्ली और आस-पास के मीडिया इंस्टिट्यूट रुपी 'दड़बों' में ठुंसे पड़े हैं , वह सभी मीडिया की इस अंधी रौशनी की चका-चौंध की तरफ खिंचे चले आये हैं, सभी को लगता है कि , वह भी आगे चल कर कोई 'बरखा दत्त , प्रभु चावला , पंकज सरदेसाई ' बन कर छा जायेंगे, पैसा तो मिलेगा ही , समाज में इज्ज़त मुफ्त में मिलेगी, 'आम' से 'ख़ास' बन जायेंगे , सोनी टीवी के 'इंडियन आइडल' की तरह, सबको 'ख़ास' बनने का 'शॉर्ट-कट' ही चाहिए बस.

आज वास्तविकता बिलकुल उलट है इसके, पत्रकारों को आज लोग समाज के उस वर्ग की श्रेणी में रखने लगे हैं , जिसमें  हमारे देश के भ्रष्ट नेता , सरकारी अफसर और भ्रष्ट पुलिसवाले बरसों से विराजमान हैं, आप किसी महफ़िल में चले जाओ तो लोग या तो शांत हो जाते हैं या बातों का विषय बदल देते हैं, आपके पीठ पीछे लोग हँसते हैं और पानी पी-पी कर गालियाँ देतें हैं सो अलग, मैं स्पष्ट रूप से ये तो नहीं कह सकता की इसका ज़िम्मेदार कौन है, लेकिन कैमराधारियों के अर्थवादी माई-बापों का इसमें बहुत बड़ा योगदान है, दिल्ली तो बदनाम थी ही , अब इन 'व्यापारियों' ने उसमे चार-चाँद और लगा दिया हैं.  


ये लेख मेरे अंतर्मन में उद्वेलित विचारों की भड़ास है, अभी बीते कुछ महीनो या फिर यूँ कहें कुछ एकाध सालों से मुझमें उफनता आत्मविश्वास का ज्वालामुखी बुझ सा गया है, कलम और कैमरे की लड़ाई में मैं अपने आप को पिसता हुआ सा महसूस कर रहा हूँ, मेरे वह पुराने क्रांतिकारी विचारों और जनता के बीच मिलते सम्मान वाले दिन अब बस एक मीठी सी याद बन कर रह गए हैं. अब तो बस जब किसी मजदूर बस्ती में या झुग्गी में जाना होता है, तो ही अपने आप को किसी 'सितारे' जैसा महसूस करता हूँ, झुग्गियों में कैमरे की प्रति वही जिज्ञासा,डर या सम्मान अभी भी बाकी है , अब इन तीन विकल्पों में से सही विकल्प आपको चुनना है , मैंने तो बस लिखा दिया.

(ये कहानी वास्तविक जीवन की घटना पर आधारित है , पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं ;) 

-प्रशांत गुप्ता 

+91-9925143545

10 comments:

  1. अब bhi समय नहीं गया गुप्ता जी पेशा बदलने की ठान ही लो :
    ४ दिन पहले औरंगाबाद मैं प्रोज़ोने मोल का अनावरण करने के लिए ऋतिक रोशन को बुलाया गया | पता था के यहाँ बहुत भीड़ होगी किसी को कुछ नहीं न्यूज़ नहीं मिलेगी पर ऑफिस के आदेश पर हमें जाना पड़ा | ऋतिक रोशन के साथ लोगो ने बतमीजी की तो सिक्यूरिटी वालो ने मीडिया कर्मियों के साथ | कैमरामेन बेचारे एक स्नाप के लिए भीड़ मैं घुसे पर दो कैमरामेन को इतनी बुरी तरह धका दिया गया और वहा से जाने के लिए कहा गया | सभी ने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई पर एक चैनल ने इस की स्पोंसर शिप ली थी बस फिर किया था सब एक तरफ और यह चैनल एक तरफ | सभी का न्यूज़ भेजने पर रोक तो लगायी पर इस चैनल ने दिखने पर सभी के फ़ोन बज उठे | " हमारे पास क्यों नहीं है" और सभी को भेजना पड़ा | हम तो लकीर के फकीर हो गयी है | इज्जत काहेकी बीत गए वो दिन | जो आप के साथ हुआ वो इस पेशे मैं रहने वाले शायद सभी के कभी न कभी महसूस किया है | इज्जत तो दिखावा होती है जब तक खबर न चले एक बार खबर चल जाये | " जय राम जी की"

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  2. I agree with you prashant but Iam not certain to what level.
    Hamare desh main insaan bikta hai, profession bikte hai, yours is not an exception.
    Poliics ki ghulam hai yeh politics, jiski laathi usiki bhais.
    Paise do jo chaiye wo bolo phir woh print media ho ya electronics media.
    Kisis ne Sahi kaha hai, akela chana bhaad nahi phod sakta.
    But yeh jwala mukhi hia kisi din kranti zarror layega, desh ko thode aur prashant Gupat Chahiye....

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  3. आपका लेख समसामयिक मीडिया (मैं पत्रकारिता शब्द को दूषित नहीं करना चाहता) की स्थिति पर एक खुला प्रहार है और इसका सत्य घटना पर आधारित होना इसको और भी प्रभावशाली बनता है |

    आज इंडिया का मीडिया पूरी तरह से सूचना के बलात्कार का दोषी है | पत्रकारिता की निष्पक्षता तो उस दिन से ही समाप्त हो गयी थी जिस दिन यह राष्ट्र उपासना का मार्ग एक धंधा और पेशा कहलाने लगा | समय हो गया इसके पतन को, तो आज इसके दुष्परिणाम अझेल हो जायें तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है | पतन की ये सीमा हो गई कि मीडिया इन्वेस्टमेंट और प्रगति का साधन समझा जाने लगा और इसका प्रमुख उद्देश्य, राष्ट्रिय चरित्रों के कर्मों की निर्भीकता व निष्पक्षता से आलोचना करना न होकर, कैरियर बनाना व विदेशी निवेश को आकर्षित करना हो गया है |

    पत्रकारिता ज्ञान की देवी की उपासना का पवित्र कार्य होता है जिसमें आत्मसम्मानी, राष्ट्र भक्त, बलिदानी और न्याय के मतवाले दृढ़ नवयुवक अपने भविष्य के स्वर्णिम सुख की तिलांजलि, राष्ट्र के भविष्य के निर्माण के लिए दे दिया करते थे | और तो और वे केवल शब्दों के शेर न होकर कर्म वीर और सेवक प्रवृति के होते थे | उनके लेख, उनके कर्म और अनुभव आधारित होते थे | उनके लेख उनकी प्रतिबद्धता होते थे | उनकी कल्पना मात्र में राष्ट्र व निर्बलों के उज्जवल भविष्य के स्वप्न ही होते थे | वे सद्पुरुष ही पत्रकार होते थे |

    किन्तु जिस प्रकार सुभाग्यहीन भारत देश की कार्मिक और वैचारिक परिस्तिथियाँ हज़ारों वर्षों से इस देश की ही शत्रु बनी हुई हैं उसी प्रकार से पत्रकारिता का महान कर्म भी पापमय होने से न बच सका है | जब से पढना लिखना और विचार करना सीख पाया हूँ और अपने पिताश्री के सानिध्य से कुछ पा पाया हूँ तब से आपने देश की दुर्दशा देखकर दुखी तो होता हूँ किन्तु आश्चर्यचकित नहीं होता हूँ | आज एक विवश और मुर्खता पीड़ित युवक के सामान अपने राष्ट्र के लोकतान्त्रिक अवस्था में होने पर भी इसके दुर्भाग्य में कई गुना बढोतरी देख मन दुखित और खिन्न हो जाता है |

    भाषा में विदेशी शब्दों का प्रयोग अपनी समझ की योग्यता के अनुसार व पूर्णता देने हेतु किया है | जिन सज्जनों को पसंद न आये कृपया बुरा न मानें |

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  5. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग जहाँ भी हुआ है, वहाँ सम्मान अपने आप ही आना छोड़ देता है ! आप किसी भी पेशे को उठा लें, ये बात हर जगह लागू होती है ! किसी भी पेशे को सम्मान देने वाले कुछ खास लोग ही होते हैं, जिनकी वजह से उनका पेशा भी सम्मान अर्जित करता है और नौजवानी उनको आदर्श मान कर उनका अनुसरण करती है !

    लेकिन जहाँ अच्छाई है वहाँ बुराई भी है ! अच्छे लोग हमेशा अच्छे रहते है और जहाँ जाते हैं, खुश्बू बन कर जाते हैं ! इसके विपरीत बुरे लोग जहाँ भी जायेंगे, अपयश ही पायेंगे !

    पत्रकारिता सत्य, न्याय, साहस का नाम है और इसे करने के लिए जुनून चाहिए, मगर कुछ लोग इसे सिर्फ़ व्यापार समझ कर करते हैं जो कि इस पेशे के लिए, पत्रकारो की नई पौध के लिए, आम जनता के लिए और देश सभी के लिए बहुत घातक है !

    '' इधर देखेगा या फिर उधर देखेगा,
    झूठ कब आँख मिला कर देखेगा..''

    धन्यवाद !

    - अरमान

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  6. प्रशांत,
    मेरा मानना है,
    "पत्रकारित्व" समाज में एक साफ़ सुथरा सा आईने का काम करता है,
    हां यह सही है कि हरेक व्यवसाय में कुछ कमियाँ और बुराईया भी होती है और नज़र भी आती है,

    इसका मतलब यह नहीं कि वह पेशा भूरा हो गया ?
    परन्तु सच्चाई से मुहं भी मोड़ नहीं सकते है,

    बस जरुरत है तो उस आईने की जो सामने आना चाहिए, चाहे वह मीडिया ही क्यों न हो,

    जो समाज को आईना दिखाने का काम करती है उसे भी अपने आपको उसमे देखना जरुरी हो गया है !

    राजेश .

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  7. अद्भुत ...................
    कभी यहाँ भी आये...................
    http://shayri9.blogspot.com/

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  8. प्रशांत,
    काफी अच्छा लगा तुम्हारे ब्लॉग पढने से...
    पत्रकारिता की सूजबुज अभी भी तुम मैं है...कुछ समूह ख़राब इसलिए पुरे पत्रकारिता को ख़राब नहीं कह सकते...आप और हम किस लिए है...गंदे माहोल मैं हमारी जिम्मेवारी और बढ़ जाती है.क्यूँ न आप और हम इसे बदलने की कोशिश भर कर ले...समय के साथ सब कुछ बदलता है..पत्रकारिता खासकर इलेक्ट्रोनिक जर्नलिज़म ट्रांसिशन के दौर से गुजर रही है ..बदलाव होगा...तस्वीर बदलेगी....एक प्रयासभर करना होगा...
    और इस बदलाव के लिए अपने भीतर के पत्रकार को जिन्दा रखना जरूरी है...

    जनक दवे

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  9. prashan bhai patrikarita kya hai ya hum kya kar rahe hai kuch din pahle ek story hindutan akhbaar main chapi ek b.s.p ke bidayak mahoday aur ek s.p ke bidayak ke beech main fasi ek ladki ki thi amar ujaala aur denik jagaran to kya kii elotroniuk media bale ne bhi himmat nahi ki karan b.s.p bidayak ke yaha ele media balo ka khas dyan rakha jata hai sab bik rahe hai bas keemat mil jaye ek baar

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  10. agree prashant ji !!!!!!!!kaafi acche se samajthe hain har pehlu ko . aage bhi aap aise hi likhte rahe . all the best

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