Tuesday, October 26, 2010

शर्म से कहो तुम 'पत्रकार' हो !!


इनसे मिलिए, ये हैं 'अजय श्रीवास्तव' 'एबीसी चैनल' से , यह कहकर मेरे मित्र ने एक सार्वजनिक समारोह में मेरा एक समूह से परिचय कराया,वह समूह, जो हम दोनों के पहुँचने से पहले हंसी और ठहाकों से गूँज रहा था , मेरे परिचय के दो शब्द सुनकर सबके चेहरों पर न जाने कैसे भाव आ गए , मैंने एक हलकी सी कृत्रिम मुस्कान और दिखावटी आत्मविश्वास के साथ हाथ बढ़ाया, सामने वाले ने भी बिना किसी भाव के मेरा हाथ बड़ी उदासीनता से छु लिया, मानों ज़बरदस्ती औपचारिकता निभानी पड़ गयी हो, बाकि लोग मुझे चिड़ियाघर से आये किसी अपरिचित जानवर की तरह ऊपर से नीचे तक घूरने लगे. "अच्छा , तो आप एबीसी चैनल में हैं ? पत्रकार हैं ..? भाई बुरा न मानियेगा लेकिन मैंने तो ये सारे हिंदी न्यूज़ चैनल देखना ही छोड़ दिया है , क्या वाहियात ख़बरें दिखाते रहते हैं .. आखरी दिन दुनिया का..भागो आई लाल मौत .. मेरे बच्चे तो डर ही जाते थे ! भाई मैंने तो अब श्रीमती जी के सीरियल्स देखना शुरू कर दिया है , कम से कम वो लोग शुरू होने से पहले ये तो बता देते हैं की इस कहानी के सारे पात्र काल्पनिक हैं और इनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है " तभी दूसरे सज्जन जिनके हाथों में कोई रंगीन पेय था , जिसकी रंगीनियत उनके चेहरे पर भी झलक रही थी , बोले " अरे यार ये साले सब बिके हुए हैं #@#*+=# , मेरा बस चले तो गोली ही मार दूँ सबको , भाई आप बुरा न मानियेगा आप तो नौकरी करते हैं , ख़बरें दिखाना तो दिल्ली वालों का काम है " एक के बाद एक सबने, अपने -अपने तरीके से न्यूज़ चैनलों को जी भर कर कोसा, मै वहां  खड़ा-खड़ा ज़बरदस्ती बस खींसे निपोर रहा था उनके साथ , और ये भी सोच रहा था की ये संजीव ने भी कहा लाकर शराबियों के बीच में फंसा दिया? कैसे खिसकुं यहाँ से ? फ़ोन हाथ में था , कान में लगा कर निकल लिया धीरे से, सबके ये दर्शा के कि कोई फ़ोन आ गया है , मन में आया कि तुरंत निकल भागूं..फिर सोचा खाना तो खा लूँ , आज तो टिफिन वाले को भी मना कर दिया है, और फिर संजीव कॉलेज का दोस्त है , बहन की शादी से ऐसे गया तो बुरा मान जायेगा, लेकिन सच कहूँ तो खाने का सोच के ही रुका मैं उस दावत में.

जैसे तैसे एक कोना पकड़ के थोड़ी देर फ़ोन पर बात करने का नाटक करता रहा , संजीव अभी भी वही खड़ा हुआ था उन लोगों के साथ, शायद मेरी वकालत कर रहा था, वो लोग भी सहमती की मुद्रा में से दिख रहे थे, मैंने बारातियों के साथ भीड़ में गुम होना ही मुनासिब समझा, खाना - वाना खाके जब में वह से निकला तो मन में विचारों की आंधी सी कौंध रही थी , बहुत ही निम्न महसूस कर रहा था मैं आज, सोच रहा था कि क्यूँ आया ऐसे पेशे में? पिताजी की बात अब शायद सही दिख रही थी, कॉम्पटीशन की तैय्यारी कर ली होती तो आज शायद गुड्डू भैया की तरह मै भी इंफोसिस या विप्रो जैसे किसी कंपनी में ९ से ५ की इज्ज़तदार नौकरी कर रहा होता लेकिन मुझे तो कल्पनाओं में उड़ना ही ज़्यादा पसंद था, सिनेमा देखना शुरू से ही बहुत पसंद था मुझे, ये वह सिनेमा ही तो था जिसने मुझे आई आई टी की कोचिंग से विमुक्त करके , मेरे अन्दर के क्रांतिकारी को जगा दिया था, कुछ बहुत बड़ा करने का जूनून और फिर सबको 'हनक' दिखाने का 'कीड़ा' जाग गया था..मुझे पता नहीं क्यूँ हमेशा से ऐसा लगता था मै 'आम' नहीं 'ख़ास' ज़िन्दगी जीने के लिए बना हूँ, सबसे अलग दिखने की , कुछ अलग करने की चाह हमेशा से ही थी मुझमें.. और सबसे आसान कैरियर मुझे 'पत्रकारिता' ही लगा जिसमें ज़्यादा पढने-लिखने की माथामारी नहीं होती, केवल 'ज्ञानबाज़ी' से ही दुकान चलती है, और इज्ज़त मिलती है सबसे ज़्यादा , मोहल्ले ,दोस्तों और रिश्तेदारों में 'हनक' अलग से.

लेकिन अब परिस्थतियाँ वैसी नहीं हैं , अधिकांश युवावर्ग जोकि दिल्ली और आस-पास के मीडिया इंस्टिट्यूट रुपी 'दड़बों' में ठुंसे पड़े हैं , वह सभी मीडिया की इस अंधी रौशनी की चका-चौंध की तरफ खिंचे चले आये हैं, सभी को लगता है कि , वह भी आगे चल कर कोई 'बरखा दत्त , प्रभु चावला , पंकज सरदेसाई ' बन कर छा जायेंगे, पैसा तो मिलेगा ही , समाज में इज्ज़त मुफ्त में मिलेगी, 'आम' से 'ख़ास' बन जायेंगे , सोनी टीवी के 'इंडियन आइडल' की तरह, सबको 'ख़ास' बनने का 'शॉर्ट-कट' ही चाहिए बस.

आज वास्तविकता बिलकुल उलट है इसके, पत्रकारों को आज लोग समाज के उस वर्ग की श्रेणी में रखने लगे हैं , जिसमें  हमारे देश के भ्रष्ट नेता , सरकारी अफसर और भ्रष्ट पुलिसवाले बरसों से विराजमान हैं, आप किसी महफ़िल में चले जाओ तो लोग या तो शांत हो जाते हैं या बातों का विषय बदल देते हैं, आपके पीठ पीछे लोग हँसते हैं और पानी पी-पी कर गालियाँ देतें हैं सो अलग, मैं स्पष्ट रूप से ये तो नहीं कह सकता की इसका ज़िम्मेदार कौन है, लेकिन कैमराधारियों के अर्थवादी माई-बापों का इसमें बहुत बड़ा योगदान है, दिल्ली तो बदनाम थी ही , अब इन 'व्यापारियों' ने उसमे चार-चाँद और लगा दिया हैं.  


ये लेख मेरे अंतर्मन में उद्वेलित विचारों की भड़ास है, अभी बीते कुछ महीनो या फिर यूँ कहें कुछ एकाध सालों से मुझमें उफनता आत्मविश्वास का ज्वालामुखी बुझ सा गया है, कलम और कैमरे की लड़ाई में मैं अपने आप को पिसता हुआ सा महसूस कर रहा हूँ, मेरे वह पुराने क्रांतिकारी विचारों और जनता के बीच मिलते सम्मान वाले दिन अब बस एक मीठी सी याद बन कर रह गए हैं. अब तो बस जब किसी मजदूर बस्ती में या झुग्गी में जाना होता है, तो ही अपने आप को किसी 'सितारे' जैसा महसूस करता हूँ, झुग्गियों में कैमरे की प्रति वही जिज्ञासा,डर या सम्मान अभी भी बाकी है , अब इन तीन विकल्पों में से सही विकल्प आपको चुनना है , मैंने तो बस लिखा दिया.

(ये कहानी वास्तविक जीवन की घटना पर आधारित है , पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं ;) 

-प्रशांत गुप्ता 

+91-9925143545

Thursday, September 2, 2010

लघुकथा ..एक गुमनाम 'पत्रकार'







मई- जून की चिलचिलाती और खाल को कचोटती हुई गर्मी.. कानों को फाड़ता हुआ गाड़ियों का शोर , जो कभी धीमा होता तो कभी कान के अन्दर  घुस कर, दिमाग को झनझना देता I नथुनों में घुसता हुआ पेट्रोल और डीज़ल का मिश्रित धुआं I 

शहर की दौड़ती- भागती इस सड़क के दूसरी ओर एक २६-२७ साल का औसत कद-काठी का युवक, जो सड़क के इस पार आने के लिए कभी कदम बढाता तो कभी दनदनाती हुई टैम्पो और बस के डर से फिर पीछे खींच लेता I सफ़ेद शर्ट, जोकि नील लगाने की वजह से, सफ़ेद थी या नीली ? इसका फैसला करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है I कमर पे टंगी काले रंग की पैंट जो सुबह -सुबह के काले आकाश की तरह सफ़ेद रंग में घुलती सी जान पड़ रही थी I बहुत जद्दोजहद करने के बाद आखिर वो शख्स मौत को चकमा देकर सड़क के इस पार आ ही जाता है I 

भट्टी की तरह तपती सड़क ...तपिश को और बढ़ाती गर्म और धूल भरी हवा I युवक सड़क के इस पार आकर साइन बोर्ड के नीचे की थोड़ी छाँव में अपने आप को ढकने की कोशिश में लग जाता है, लेकिन सर पे रखे सूरज की वजह से सर का कुछ हिस्सा ही ढक पाता  है I थोड़ी सांस लेने के बाद फिर उसकी आँखों में वही हलचल नाचने लगती है, और सड़क के दाहिनी और न जाने किसको खोजता हुआ ? नज़रें दौड़ाने लगता है I

आइये हम इस युवक के अंतर्मन से ही इसकी कहानी को जानने की कोशिश करते हैं...

अभी तक नहीं आई १२ नंबर? कहीं निकल तो नहीं होगी ? बड़ी मुश्किल से आज विनय जी ने टाइम दिया है .. कपडे तो सही हैं..दाहिने जूते की सिलाई थोड़ी सी खुल गयी है, लेकिन थोड़ा अंगूठा दबा के चल लूँगा .. लेकिन आज विनय जी को इम्प्रेस कर देना है बस किसी तरह.. फाइल में सारी रिपोर्टें हैं की नहीं ? 'दैनिक' में पाठक कोने में छापे सारी कटिंग हैं की नहीं? फिर से चेक कर लेता हूँ ज़रा .. 

तभी तूफ़ान की तरह पीली सफ़ेद पुती हुई बस जोकि एक तरफ से झुकी होने की वजह से अपंग सी जान पड़ रही थी, दनदनाते हुए सड़क पे आ धमकी, ठसा ठस भरी हुयी I  एक खिड़की से पांच-पांच लोगों के सर ऐसे झाँक रहे थे जैसे मुर्गी के दड़बे में मुर्गियां ठूंस दी जाती हैं I  आगे और पीछे हैंडिल पर लोग सावन के झूलों की तरह झूल रहे थे I  मैंने दया प्रार्थी नज़रों से हैंडीलों पे झूलते लोगों की तरफ देख कर  नज़रों ही नज़रों में जगह देने की गुहार लगाई, लेकिन सबके चेहरे ऐसे कठोर हो गए जैसे किसी राजा से उसकी सत्ता मांग ली गयी हो, अंत में, मरता क्या न करता किसी तरह से बस के हैंडिल के एक सिरा तो मेरे हाथ आ ही गया, बस ने भी गति पकड़ ली, कुछ सेकंड हवा में झूलने के बाद मैंने पैर भी जमा लिए .. अहहहा.. बस के चलने के साथ ही माथे और भौवों पे जमा हुआ पसीना ठंडा सा महसूस होने लगा, थोड़ा थोड़ा बहते हुए होटों पे आ गया और नमक चखा गया I 

बस में खड़े होने के साथ ही साथ मुझे कमर में घुसी फाइल की भी रह-रह कर चिंता हो रही थी I हाथ से तो टोह नहीं सकता था, इसलिए अपनी कमर  को मेरे पीछे लदे व्यक्ति को हल्का रगड़ के टोहा, पता नहीं मेरी इस हरकत का उस व्यक्ति को क्या सन्देश गया होगा? लेकिन इन सबकी फिकर कहाँ थी मुझे आज ... मन में मिश्रित भावनाएं हिलोरें मार रही थीं..थोड़ा सा डर, थोड़ा-थोड़ा रोमांच , थोड़ी सी अनजानी सी ख़ुशी और कहीं कोने में घुसा हुआ आत्मविश्वास . लेकिन कुछ भी हो .. मुझे आज तो अपनी लेखन और पत्रकारिक क्षमता से विनय मिश्रा जी को तो इम्प्रेस कर देना है, दुबे जी से फोन तो करा दिया था I दुबे जी ने तो बोला ही था "अरे यार मिश्रा तो मेरा चेला है चेला .. मै एक बार कह दूँ न तो कुर्सी से उठे न वो.., तुम बस जाना और कहना, मुझे सरसइयां वाले दुबे जी ने भेजा है, फिर देखना " I

फ़ोन पे तो बड़े ही नम्र तरीके से बात करी थी विनय जी ने .. आज तो काम बन ही जायेगा, फिर मैं दिखा दूंगा मोहल्ले के सारे लड़कों को, जो मुझे कमज़ोर और बेबस समझते हैं, शरीर से नहीं तो क्या हुआ ..? मै अपने आप को कलम से बलवान करूँगा, जब सबको पता चलेगा कि मैं शहर के सबसे बड़े अखबार का 'रिपोर्टर' बन गया हूँ, तो सब मुझसे इज्ज़त से पेश आयंगे I मालिक मकान जो हर बार किराया न बढ़ाने पर माँ को मकान खाली करने की धमकी देता रहता है  और आये दिन उसका बेटा अपने दोस्तों को बुला कर ऊपर  जो हमारे घर की तरफ ताका करता है ,उसका भी मुंह चुप हो जायेगा I बहन को कॉलेज के लिए बस पकड़ने के लिए चौराहे पर छोड़ने के समय लोग जैसे मुझे और बहन को घूरते हैं, फिर मैं भी उनको जमके घूर दिया करूँगा..

पिताजी अगर आज होते तो मैंने ये सेल्समैन की नौकरी न करके 'जर्नालिस्म' की पढाई कर ली होती, फिर शायद किसी बड़े मीडिया संस्थान में लग जाता I लेकिन २४ नंबर वाले पप्पू ने तो कुछ भी नहीं किया था .. हाई स्कूल में तो मेरे साथ ही था , फेल होने के बाद उसके विधायक पिताजी ने उसको कहीं बाहर भेज दिया,२-३ साल बाद आया तो बोला कि "बाहर से इंटर करके आया हूँ," घिस -पिट के बी. ए. निकाला था उसने, लेकिन उसके पिताजी ने 'सेटिंग ' करके उसको चैनल में लगवा दिया है, आज तो निकल पड़ी है उसकी, दिन भर ओबी में घूमा करता है, बड़े-बड़े पुलिस वालों और नेताओं के साथ उठना बैठना है उसका आज-कल . . काश मै भी ...!

"बड़ी सड़क बड़ी सड़क"..., अचानक इस तीखी सी आवाज़ ने मुझे सपनों की दुनिया से बहार ला पटका, और मुझे ध्यान आया यहीं तो है 'दैनिक ' का ऑफिस.. पैरों को हवा में झुला कर दौड़ने लगा , ज़मीन छूते ही पैर भी दौड़ने लगे .. बहुत तेजी से पैर चलाने के बाद भी मैं  बस को हरा नहीं पाया और दोनों हाथ छूट गए.. लड़खड़ाते हुए घिसट सा गया सड़क पर..जल्दी से उठ कर कमर में लगी फाइल  को ढूंडा .. शुक्र है , वो वहीँ जमीं थी. दोनों हाथों की हथेलियों में से उगते सूरज की लालिमा जैसे अन्दर की खाल बाहर झांकने लगी थी, मैंने दोनों हाथों को अपनी कमर में रगड़ के साफ़ किया और फाइल को निकाल कर आगे की तरफ चल पड़ा I 

कुछ दूर चलने के बाद मेरी मंज़िल आ गयी.. शहर के सबसे बड़े अखबार 'दैनिक' का ऑफिस .. बड़ा सा काला  गेट, बाहर खड़े सिक्यूरिटी गार्ड, गेट के किनारे डब्बे से दिखने वाला सिक्यूरिटी गार्ड का चैंबर. "किस्से मिलना है ?" "जी, विनय मिश्रा जी से" "आपको बुलाया है?" "जी हाँ, आज २:३० का समय दिया था " "आज तो प्रेस के मालिक लोग आये हुए हैं,आज का टाइम दिया है आपको?" "जी आप इंटरकॉम पे बात करके पूछ लें , मैं विनायकपुर से आया हूँ, इंतज़ार कर लूँगा अगर अभी फ्री नहीं हुए हैं तो" "ठीक है, पूछता हूँ , आप ज़रा खिड़की से किनारे हो कर खड़े हो जाइए , बात होते ही आपको बुला लिया जायेगा", "जी सर" .

थोड़ी-थोड़ी सी धड़कन तेज़ होने लगी थी शायद, सोच रहा था कि आज मुलाकात हो पायेगी या नहीं? मै बार-बार सिक्युरिटी वाले की नज़रों में आने की कोशिश करता रहता था, जिससे उसको याद रहे कि मैं खड़ा हूँ यहाँ..लगभग २ घंटे खड़े होने के बाद जब मैं वापस खिड़की में झाँकने गया तो वो सिक्युरिटी वाला गायब था और कोई और आ बैठा था उसकी सीट पर.."सर मै वो, विनय मिश्रा जी से मिलना था" , "साहब को मैसेज दिया आपने ?" "जी हाँ,आपसे पहले जो 'सर' थे, उन्होंने बोला था वेट करने को" "ठीक है मै देखता हूँ" इतना कह कर वो सामने रखे ढेर में न जाने क्या ढूँढने लग गया, अब तो बहुत गला सूख रहा था  मेरा, सामने पान की चलती फिरती दुकान जिसके पहियों को देख के लगता था कि सदियों से ये चलती फिरती दुकान यहीं पर स्थायी हो गयी है , एक बहुत मोटे से पेट वाला एक व्यक्ति घुसा हुआ बैठा था, जैसे किसी भूसे के ढेर में हाथी घुस गया हो..

"भईय्या पानी है क्या पीने वाला, थोड़ा सा?"  " हाँ-हाँ भईय्या बिलकुल, ये लो" कहकर उसने स्टील का एक लोटा मेरी तरफ बढ़ा दिया, किनारों के अन्दर कत्था छुपा जा रहा था .. मैंने तुरंत ही पूरा लोटा खली कर डाला.. आह्हा.. पानी ठंडा था, गले से होते हुए भूख और गर्मी से जलते हुए पेट तक ठंडक पहुंचा दी उसने."क्या हुआ भैया? बहुत देर से किसी का इन्तजार कर रहे हो?" पान वाले ने पुछा. "हाँ भाई, विनय मिश्रा जी से मिलना था, लेकिन पता चला कि आज प्रेस के मालिक आये हुए हैं इसलिए मिश्रा जी व्यस्त हैं", "अरे वो तो आके कबके चले गए ? चलो कोई बात नहीं, आठ बजे वाले हैं, मिश्रा जी घर पे जाये के पहले हमारा पान ज़रूर खाते हैं, यहीं मिल लेना थोड़ी देर में", इतना सुनते ही मन में फिर से कई सवाल चलने लगे, ऐसे खड़े होके क्या बात करूँगा ? कैसे करूँगा? पता नहीं बात ठीक से करेंगे कि नहीं? 

फिर सोचा जो होगा देखा जायेगा आज, लगभग साल तो होने को आया 'दैनिक ' के लिए पाठकीय भेजते -भेजते , सैकड़ों तो पोस्टकार्ड लिख डाले संपादक के नाम, आज जो भी हो मिल के ही रहूँगा. मन में इष्टदेव कम नाम लिया और दरवाजे की तरफ टक-टकी लगाये देखने लगा. थोड़ी ही देर बाद बड़ा गेट खुला और आगे से चपटी हुयी कार, शायद 'सिएलो' रही होगी, गेट से निकली और एक तरफ जाकर सड़क किनारे रुक गयी, उल्टा ट्रैफिक होने की वजह से शायद कार यहाँ तक नहीं आई. कार में से लगभग ४०-४५ की उम्र का पैंट-शर्ट पहने हुए औसत कद का व्यक्ति निकल के दुकान की तरफ आने के लिए सड़क के दोनों ओर झाँकने लगा I 

"यही तो हैं मिश्रा जी , चिंता न करो यहीं आ रहें हैं" मै तुरंत जेब में रखे रुमाल को ढूंडने लगा, चेहरे पर पसरी घबराहट को समेटने के लिए,वो व्यक्ति, जिसके लिखे लेख और सम्पादकीय मेरी दिनचर्या का हिस्सा थे..मेरे लिए आदर्श...जो स्वयं मेरे लिए श्री कृष्ण के सामान थे  और उनकी लेखनी 'सुदर्शनचक्र' .. वो 'आदर्श' आज मेरे सामने है ..मेरी हृदयगति बढ़ने लगी..  कुछ कदम का फासला चल के वह दुकान पर आ कर खड़े हो गए, एक बार जब नज़रें मिली तो मैंने चेहरे पर कृत्रिम मुस्कान रखकर गर्दन को थोड़ा नीचे की तरफ लचका दिया, जवाब में उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं दिखा. " आइये साहब, ये लीजिये आपके पैकेट, दो बनारसी और एक मीठा गुलकंद वाला" "अभी बनाये हो न ?" "क्या साहेब, कभी आपको लगा है कि बासी दिए हों ? जो आज देंगे? अच्छा साहब ये अजयकुमार हैं आपसे मिलने के लिए आये हैं, दू घंटा से इन्तेजार कर रहे हैं, हम कहे साहब से एहिना मिल लीजियेगा, हमरे पान के बिना थोडेही जाते हैं साहेब घर? 

"जी बताएं.." यह कह कर वह मेरी तरफ मुड़े .. " सर मेरा नाम अजय है , मेरी आपसे फ़ोन पे परसों बात हुयी थी , आपने आज २:३० का समय दिया था,मै सर समय से आ गया था लेकिन आपके यहाँ शायद कोई बड़े सर लोग आये थे , इसलिए मैंने यहीं पर प्रतीक्षा करना उचित समझा" मैंने एक सांस में सब उगल दिया .. लेकिन शायद मुझे लगा कि, मै कुछ भूल गया .. हाँ , दुबे जी का नाम तो बोला ही नहीं .. इससे पहले मैं कुछ और बोलता, वो बोले " लेकिन किसलिए मिलना चाहते थे आप ?" " वो सर..मै सर.. सर मुझे वो दुबे जी ने भेजा था .. उन्होंने आपसे बात की थी " "कौन दुबे जी ?" " जी, वो दुबे जी जिनका रामबाग में 'शहर जाग्रति प्रेस' है ..सरसैयाँ वाले " "मुझे कुछ याद नहीं आ रहा है , खैर आप मिलने का उद्देश्य बताएं" " सर मै एक पत्रकार हूँ , आपके अखबार से एक स्ट्रिंगर की तरह जुड़ना चाहता हूँ , मेरे लेख लगभग हर पाठकीय में 'दैनिक' में छपते हैं .." "अभी फ़िलहाल किसके साथ जुड़े हैं आप?" " जी सर, मैंने कई पत्रिकाओं में अनेकों आर्टिकल भेजे हैं , 'शहर जाग्रति' और 'डूबता सूरज' में मेरे ये लेख छपे हैं सर, और मेरे पास अभी बहुत कुछ खोजी रिपोर्ट हैं " ये कहके मैंने फाइल को खोल के आगे बढ़ाया.. "ठीक है , आप के पास अभी कुछ है  ?" "जी सर ये है , ये मैंने ३ महीने में तैयार की है , सर ये नगर पालिका में फैले भ्रष्टाचार को लेकर है, फोटो भी है सर इसमें, बड़ा खुलासा होगा सर" "ठीक है , दे दीजिये , मै देखता हूँ, आपका नंबर है कोई ? " "जी सर , लिखा है नीचे , बगल का ही है, बात हो जाएगी " "ओके , मैं बताता  हूँ आपको " इतना कह कर वो मुड़  गए और सड़क पार करने के लिए दोनों तरफ ताकने लगे. मेरे दिल की धड़कन अपने चरम पर थी, पेट में हवा चक्कर मार रही थी, भूख -प्यास सबका एहसास मर चुका था , वो पान वाला तो ऐसा लग रहा था कि स्वयं भगवान ने नीचे उतर कर मेरी मदद करी हो, हाथ जोड़ कर धन्यवाद् किया उस पानवाले को, सोचा पैर छु लूँ , थोड़ा आगे भी बढ़ा लेकिन फिर संकोच कर गया. और तेज़ कदमों से बड़ी सड़क की तरफ बढ़ने लगा I 

मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने शायद विश्वविजय कर ली हो , नख से शिख तक आत्मविश्वास से सराबोर, मन-ही-मन मुस्कुराता कब मैं बस पकड़ के अपने मोहल्ले के चौराहे पर उतर गया पता ही नहीं चला? लाईट नहीं आ रही थी पूरे एरिया में , सब लोग घर के बाहर थे अधिकतर , बनवारी की दुकान पर रोज़ की तरह मजमा लगा हुआ था, मैं हमेशा से इस दुकान के पीछे की गली से घर जाता था , जिससे मोहल्ले  के लड़कों का सामना नहीं करना पड़े, जो अक्सर मेरा मजाक उड़ाया करते थे.लेकिन आज मै जान-बूझ के बनवारी की दुकान पर गया."क्या हुआ अज्जू कहाँ से जंग लड़ के आ रहे हो?" "कहीं नहीं , बस बड़ी सड़क गया था " "बड़ी सड़क? इतनी दूर? क्या काम आ गया तुम्हारा  ??" "कुछ नहीं बस ऐसे ही , वो विनय मिश्राजी ने बुलाया था " "विनय मिश्रा, दैनिक वाले? तुम्हे किसलिए बुलाया था ? दैनिक में पोछा मारने?" इतना कह के, दुकान वाले बनवारी को छोड़ कर, सभी लोग हंसने लगे ..मै आगे बढ़ गया , पीछे से आवाज फिर से सुनाई दी "पोछा ठीक से मारा की नहीं ?" मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, मन कर रहा था इन सबको जवाब दे दूँ , लेकिन फिर मैंने अपने मन को समझाया .. इन लोगों को तो समय दिखायेगा , जब मै 'दैनिक' का पत्रकार बन जाऊंगा तो ये सब भी मेरे आगे -पीछे घूमेंगे . तब इन्हें इनकी औकात दिखाऊंगा. सोचते -सोचते घर की सीढियां चढ़ गया I 

खाना सामने होते हुए भी खाना खाने का मन नहीं कर रहा था, पूरा घटनाक्रम मेरी आखों के सामने बार-बार घूम रहा था,मैं सोचे जा रहा था कि शायद नमस्कार की जगह 'हेलो सर' कह के हाथ मिलाया होता तो ..?  विनय जी मेरा आर्टिकल अभी पढ़ रहे होंगे या खाना कहने के बाद पढेंगे ? या फिर हो सकता है कि उन्होंने पढ़ लिए हो और उनको इतना पसंद आया हो कि वो अभी मेरे पी. पी. नंबर पर फ़ोन मिला रहें हों? सोच कर मैं उठने लगा तो माँ ने टोका " खाना तो खा लो , सुबह से न जाने कहाँ घूम रहे हो ? खाना खाके ही कहीं जाना" जैसे तैसे जल्दी -जल्दी खाना खाके , मैं मेरे पास वाले दत्ता अंकल के यहाँ जाने के लिए भागा. पूरे मोहल्ले में लाईट नहीं आ रही थी. दत्ता अंकल के गेट से मैंने उचक कर अन्दर झाँका तो कोई दिखा नहीं.. मैंने इतनी रात को दरवाजा खटखटाना उचित नहीं समझा, और बाहर ही गेट के पास ये सोच के खड़ा हो गया कि, शायद फ़ोन आये तो आंटी को मुझे बुलाने के लिए दूर न जाना पड़े , या हो सकता है रात के कारण वो मना ही कर दें.? इसी कश्मकश में, कब रात का १ बज गया? पता ही नहीं चला ..चौकीदार ने मुझे टोका "क्या अजय भाई , इतनी रात में , यहाँ?" "कुछ नहीं, काम से आया था , जा रहा हूँ" कहकर में अपने घर की ओर चल दिया, पूरी रात सोचते -सोचते बीत गयी I 

सुबह उठ के सबसे पहले 'दैनिक' देखा.. शायद मेरी खबर छप गयी हो , लेकिन पूरे पेपर में कहीं नहीं मिली,  सोचा, शायद अब फ़ोन आएगा , अब आएगा , इसी चक्कर में काम पर न जाके, दत्ता आंटी की सेवा में लग गया , दत्ता आंटी  ने घर के सिलेंडर से लेकर सारी सब्जियां मंगा डालीं मुझसे, लेकिन आज मैं उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानने वाला था. पूरा दिन बीत गया अपने मन को दिलासा देते -देते, लेकिन फ़ोन नहीं आया I 

दो दिन बीत जाने के बाद जब फ़ोन नहीं आया तो मेरे सब्र का बाँध टूट गया , पूजा की अलमारी रखा चिल्लर उठा कर पीसीओ पहुँच गया, "हेलो दैनिक? मिश्रा जी से बात कराइए , विनय मिश्रा जी से " "आप कौन?" "जी मैं , अजय कुमार बोल रहा हूँ विनायकपुर से " फ़ोन पर मधुर धुन सुनाई देने लगी , और मैं मन-ही-मन सेकेण्ड गिनने लगा.."हेलो," "मिश्राजी , मै अजय कुमार बोल रहा हूँ , विनायकपुर से , आपसे मिला था सर , पान की दुकान पे , वो सर मैंने लेख दिए थे आपको कुछ , सर वो छपे नहीं सर , शायद भूल गए थे आप?" " हेलो -हेलो, एक मिनट रुको भाई , वो तुम्हारे लेख नहीं छप सकते, काफी कमियां हैं उसमे" "क्या कमियां हैं सर ? मैंने तो  सारी फोटोएं  भी दी थी ? " "फोटो साफ़ नहीं हैं और कई कमियां हैं, कुछ और दूसरा भेजना देखता हूँ, और ये वापस चाहिए तो लेकर जाना गेट पर गार्ड से ".. इसके बाद  कर टू-टू की आवाज सुनाई देने लगी , मुझे लगा कि इतनी जल्दी फ़ोन कैसे कट गया? मै पी सी ओ वाले पर गरजा "ओ भैया , ये इतना जल्दी कैसे कट गया , ९० सेकण्ड का कॉल होता है , हमें पता है " "अरे भाई कटा नहीं है ,उधर से रख दिया गया है फ़ोन" इतना सुन कर मेरी आखों के सामने अँधेरा सा छा गया, समझ में नहीं आ रहा था क्या करूँ?  सीधे घर आ गया वापस और विचारों में खो गया , आँख कब लग गयी पता ही नहीं चला.

दुसरे दिन से मैंने अपने मन को फिर समझाया , चलो अबकी बार कोई ऐसी सनसनीखेज खबर ढूँढ के निकालूँगा कि विनय जी क्या.. शहर के सारे अखबार और इलेक्ट्रौनिक मीडिया के संपादक मुझे ही ढूँढेंगे. इसी सोच के साथ मैं अपनी 'सेल्समैन' की नौकरी करने के साथ-साथ शहर के ज्वलंत और कब्रनशीं मुद्दों को ढूँढने में लग गया I 

रविवार की सुबह, मैं आज थोड़ा देर से उठा , रात को लौटते हुए देर हो गयी थी. रसोई से कुछ बनने की ख़ुशबू आ रही थी, बहन पूजा कर रही थी, कमरे में धुआं-धुआं सा  फैला हुआ था. मै उठा, और आदतन सीधे घर के छज्जे की तरफ अखबार उठाने के लिए चल पड़ा, ओस से आज अखबार थोड़ा गीला सा हो रखा था, सो मैंने बाथरूम में जाने से पहले पंखे के नीचे अखबार सूखने के लिए रख दिया I 

नहा-धो के निकलने के बाद, जब मेरी नज़र अखबार पर पड़ी तो मेरी धडकनें बढ़ गयीं, मेरी दी गयी खबर की फोटो थी ये तो.. मैंने आनन्-फानन में पन्ने पलटने शुरू कर दिए , ये तो मेरी ही खबर थी.. मगर इसका पहला पन्ना कहाँ हैं जहाँ पर मेरा नाम छपा होगा ? मै चिल्लाया "पेपर का पहला पन्ना कहाँ है? " "अरे वो नीचे वाले गुप्ताजी लेकर चले गए हैं , कोई बड़ी खबर है कह रहे थे" मैं भागा , "गुप्ताजी , वो पेपर दीजिये न , मेरी रिपोर्ट छपी है आज , लाइए दिखता हूँ " " तुम्हारी रिपोर्ट ? कहाँ छपी है? 'दैनिक वालों  ने बहुत बड़ा खुलासा किया है , इसलिए मै 'दैनिक ' लाया पढने के लिए" ये कह कर उन्होंने मुझे पेपर थमा दिया I 

पेपर देखते ही मेरे पैरों तले ज़मीन निकल गयी.. मै जड़वत हो गया वहीँ-के-वहीँ , कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था , आखिर विनय जी ऐसा क्यूँ किया ? क्या होता अगर वो मेरा नाम छाप देते इस खबर के साथ ? उनका क्या चला जाता अगर मेरी खबर को मेरा ही नाम दे देते ?? वो तो हमेशा ही अपने लेखों में नैतिकता एवं सार्थक पत्रकारिता की बातें करते हैं .. अभी पिछले ही संपादकीय में उन्होंने ये कहा था कि पत्रकार तो समाज एवं एवं सत्य का प्रहरी होता है.. वास्तविक पत्रकार वो होता है जिसके लिए अपने देश और समाज के प्रति जूनून और जस्बा होता है.फिर क्यूँ वो अपने ही शब्दों से फिर गए ? वो तो मेरे आदर्श थे .. तो फिर क्या अंतर हुआ अवसरवादी नेताओं और संपादकों में ?

मेरे आत्मसम्मान और वजूद की लड़ाई में मैं हार चुका था अब, पेपर को हाथ में लेकर घर की सीढियां चढ़ता जा रहा था, आँखों से बहता हुआ नमकीन पानी फिर से होठों  को खारा कर रहा था, आज पता नहीं क्यूँ अच्छा लग रहा था ये नमक... आदत सी जो पड़ चुकी थी ..... 


-Prashant Gupta 

www.krantee.com

Friday, July 30, 2010

चलो थोड़ा धो लें ...(आगे अपने विवेक से सोचें )






'पत्रकारिता' ..एक ऐसा कुलीन पेशा, जिसे कभी समाज में उच्चतम दर्ज़ा प्राप्त था.. समाज का चतुर्थ स्तम्भ , सत्य के प्रहरी , कलम के सिपाही आदि इत्यादि उपनामों से 'पत्रकारों का संबोधन किया जाता था .. लेकिन आज स्थिति बिलकुल उलट है इसके .. आज के समय में उन्ही को 'पीत पत्रकार' , 'सैटिंगबाज़' 'लाईज्नर' आदि की संज्ञाओं से सु-शोभित किया जाता है.. मै इस विषय में ज़्यादा   'ज्ञानबाज़ी' तो नहीं करना चाहता, लेकिन भारतीय पत्रकारिता को इस प्रकार दम तोड़ते हुए देख भी नहीं सकता हूँ, आज ये विषय हम पत्रकारों के लिए 'ग्लोबल वार्मिंग' से भी खतरनाक हो चुका है जो जल्द ही बची-खुची पत्रकारिता को भी डुबो देगा.. इस पर चिंतन और यथासंभव कार्यान्वन निश्चित ही ज़रूरी है.. मेरे निजी विचार से निम्नावार्नित कुछ ऐसे तथ्य हैं जिन पर प्रकाश डाल कर हम पत्रकरिता की इस स्थिति  का विचार-मंथन कर सकते हैं.. भारतीय पत्रकरिता को इस स्थिति में पहुँचाने के लिए ज़िम्मेदार निम्न तथ्यों पर कृपया गौर फरमाएं..

१) सूचना एवं प्रसारण  मंत्रालय की  रेवड़ियाँ :  १९९५ के बाद देश में 'इलेक्ट्रोनिक मीडिया साइक्लोन' आ गया था, भारत जैसे देश में मीडिया की बढ़ती ताक़त एवं मीडिया के साथ जुडी जनभावना की खबर नौकरशाहों एवं दिल्ली में बैठे सफेदपोशों को थी, वे अच्छी तरह जानते थे, कि मीडिया किस प्रकार से जनता  की भावनाओं के साथ जुड़ गयी है, नेताशाही और नौकरशाही दोनों को इस बात की फिक्र हो चली थी कि यदि मीडिया की शक्ति इसी प्रकार से जन-मन को प्रभावित करती रही तो इसके दुष्प्रभाव उनकी काली मंशाओं पर पड़ सकता है, साथ ही मीडिया का स्वरुप अब इतना बड़ा हो चुका था कि भारत जैसे प्रजातान्त्रिक देश में मीडिया पर पाबन्दी लगाना या कोई नियामक बैठना लगभग असंभव सा ही था.. इसका एक मात्र उपाय इसका स्वरुप बिगाड़ कर और इसकी लोकप्रियता को कम करके अपना उल्लू सीधा करना था .
दिल्ली में बैठे नौकरशाहों ने सामाजिक उदारता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सेटेलाइट खबरिया चैनलों को लाइसेंस बांटने के लिए दोनों हाथों  से रेवड़िया बांटनी शुरू कर दी, जिसके परिणामस्वरूप बड़े-बड़े व्यापारी जिनका दूर -दूर तक पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं था, वह भी 'जुगाड़' करके न्यूज़ चैनल खोल कर अपनी दुकान चमकाने लगे.

२) मीडिया का दुष्प्रचार : मीडिया की शक्ति और आम-जन के साथ उसकी भावना को देखते हुए, हर पक्ष चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई उसके माध्यम से अपना राजनितिक उल्लू सीधा करना चाहता था और आज भी है, जिसके परिणाम स्वरुप जन्म हुआ 'पीत-पत्रकरिता' का और मीडिया में घुस आये इन 'व्यापारियों' की चांदी कटने लगी , ये दौर इन 'व्यापारियों' के लिए सबसे सुनहरा दौर था. 
और इसी दौरान जिनका उल्लू सीधा नहीं हुआ, उन्होंने मीडिया के ही खिलाफ मोर्चा खोल लिया, और उसको ही बता दिया सम्बंधित पक्ष के साथ मिला हुआ. 

इस दौर में शायद ही कोई ऐसा विभाग,समूह, राजनितिक दल, उद्योग, प्रसिद्द व्यक्ति विशेष नहीं होगा जिसको मीडिया ने छुआ न हो या प्रभावित न किया हो. पक्ष में बोला तो ठीक , और यदि पोल खोल दी तो व्यक्ति या समूह विशेष मीडिया का विरोधी बन गया.

इसका परिणाम ये हुआ कि,धीरे -धीरे मीडिया के विरोधी ज़्यादा हो गए हैं और पक्षधर कम क्योंकि ये बात तो जग-ज़ाहिर है.. कि हमाम क्या है और नंगे कितने हैं..? इसका नवीनतम उदाहरण आजतक के दफ्तर पर आर एस एस के कथित हमले को लेकर जब आज तक ने अपनी ही वेब साईट पर जनता की राय मांगी को विपक्षी ज़्यादा निकले और पक्षधर कम.जिससे चैनल की काफी किरकिरी हुई.

३) हमारा सिनेमा : एक चैनल ने जब मीडिया में फैली गन्दगी और सिनेमाजगत के गुरुओं को छेड़ना शुरू किया तो, सिनेमा में भी एक बड़ा गुट इनके विरुद्ध लामबंध हो गया, और जो नहीं हुए वो न इनके पक्ष में थे न विपक्ष में, जिसका सीधा असर हमारे समाज में खासा असर रखने वाले सिनेमा में मीडिया की छवि को लेकर हुआ. नतीजतन, वही भारतीय सिनेमा जिसमे कभी नेता और सरकारी अफसर को घूस लेते हुए दिखाया जाता था, वहीँ मीडिया कर्मियों को उसी कतार में लाकर खड़ा कर दिया गया.
धीरे धीरे हमारी फिल्मों में 'पत्रकार' सच के लिए जान देने वाला नहीं, सच के लिए जान लेने वाला बन गया. महेश भट्ट ने फिल्म 'शो बिज़' तो रामू ने फिल्म 'रण' से अपने नज़रिए से मीडिया को दिखाया.

४) कलम विरुद्ध कैमरा : इलेक्ट्रोनिक मीडिया की लोकप्रियता और झट-पट मसाला चाट जैसी ख़बरों से अखबारों को अपने भविष्य पर ख़तरा मंडराता दिखाई देने लग गया, परिणाम ये हुआ कि एक -दुसरे पर  वार-प्रतिवार का दौर शुरू हो गया, सं २००० के आस पास ऐसा महसूस होता था कि दोनों पेशे अब पेशेवर तरीके से एक दुसरे की उधेड़ने में लग गए हैं , चैनल वाले कहते थे अखबार फ़ालतू है और अखबार वाले चैनलों को गालियाँ देते थे, इन सब में मौज में थे नेता और नौकरशाह, वो तो जैसे ऐसा ही चाहते थे, सब कुछ प्रायोजित सा लगता था, इन सब का सीधा असर दोनों ही प्रकार की मीडिया की छवि पर पड़ा. 

५) कैमरा विरुद्ध कैमरा   : एक दौर ऐसा भी आया जब 'व्यापारियों' और असल पत्रकारों में जंग शुरू हो गयी इलेक्ट्रोनिक मीडिया में, हम सबको बचपन में पढाया जाता था कि लक्ष्मी से ज़्यादा बलवान है सरस्वती, लेकिन वास्तविकता इसके बिलकुल उलट है, इस जंग में जीत हुई लक्ष्मी की ... और 'सरस्वती' के उपासको को कोने में फेंक दिया गया, हर एक चैंनल में एक भूत ऐसा छा गया था जिसने सबको वश   में कर लिया था, वह नवजात भूत था 'टी आर पी', जिसके लिए चैनलों ने एक-दुसरे के ही खिलाफ तलवारें निकाल लीं, नतीजतन, जनता के सामने स्थिति हास्यास्पद हो गयी.

और हाँ, 'टी आर पी ' नामक नवजात को हष्ट पुष्ट और बलवान करने में उनके जनकों से कहीं ज़्यादा नौकरशाहों और नेताओं का योगदान है, इस 'टी आर पी' का नेताओं और उनके चमचों ने गला फाड़ -फाड़ कर जनता में प्रचार किया और मीडिया की  छवि को धूमिल करके 'कलम' को मरणासन्न कर दिया.

इस लेख को लिखने का मेरा मकसद गड़े मुर्दे उखाड़ना नहीं है, न ही मै कोई 'मीडिया-सुधारक बाबा' हूँ.. प्रजातान्त्रिक देश में रहता हूँ, आरोप लगाने और आरोपों का खंडन करने कि आजादी है मुझे.. एक हालिया पिक्चर का डायलौग सुना था कहीं ' तुने मेरी मारी, अब देख मै तेरी कैसे बजाता हूँ' , तो बंधू , मारने और बजाने की आजादी तो भारत जैसे देश में ही मिल सकती है जहाँ दुनिया में सबसे ज़्यादा लगभग २५० से भी अधिक तो केवल 'न्यूज़ चैनल' हैं, और अखबारों  की सख्या तो ठीक से याद नहीं पर वो भी है दुनिया में सबसे ज़्यादा, तो क्या हुआ हमारे यहाँ भ्रष्ट नेता भी सबसे ज़्यादा हुए, अब तो शायद भ्रष्ट मीडिया भी सबसे ज़्यादा.... 


-आपका अपना 

'अज्ञान-गुरु'

प्रशांत गुप्ता 

Thursday, June 24, 2010

कुछ मेरे बारे में...






किसी ने कहा है कि, "अगर आपमें लिखने की कला है, मगर इतनी नहीं कि उपन्यास लिख सकें.. और जिरह करने की क्षमता है लेकिन इतनी नहीं कि वकील बन सकें..तो आप 'पत्रकार' ज़रूर बन सकते हैं.." शायद इसी कारण से मैं भी 'पत्रकार' बन गया..

जन्म एवं शुरूआती पढाई उत्तर प्रदेश के 'कानपुर' जिले में हुई, कानपुर जो की कभी अपनी कपड़ा मिलों के लिए जाना जाता था, लेकिन अब शायद 'अपराध' एवं 'मज़हबी-दंगों' के लिए 'विश्व-कुख्यात' है..

बचपन से ही स्कूल की किताबों को छोड़ कर, कोई भी किताब पढने का शौक था..कॉमिक्स,चम्पक,चंदामामा और जब कुछ नहीं मिला तो 'अटरिया' वाले शिवमंगल भैया की उपन्यास ही चाट जाया करता था.. और हाँ, रोज़ सुबह का अखबार तो दिनचर्या का हिस्सा था ही..

मोहल्ले और आस-पास में घटते लड़ाई-झगडे,घरेलु फसाद राजनितिक जोड़-तोड़ की तो अघोषित 'डिग्री' अपने आप ही मिल गयी थी हमें.. चाचा वकील थे तो फूफा नेता, इन्ही सब को देखते समझते बचपन जैसे तैसे बीत ही गया..

'कन्फ्युज' मैं बचपन से रहा थोड़ा, बचपन में जब कोई पूछता था की बेटा बड़े होकर क्या बनोगे ? तो मैं सोचता था कि, मै कोई ज्योतिष हूँ क्या? ?जो इत्ती सी उम्र में दस-बीस साल का भविष्य बता दूंगा ..फिर जब माताजी ने डांटा की 'देखो पपुआ कैसे बोलता है सबसे.. डॉक्टर बनेगा..वैसे तुम भी तो कुछ बोलो' फिर बहुत 'कन्फ्यूजन' के बाद मैंने 'इंजिनियर' कहना चालु कर दिया, परिणामस्वरूप सबकी शाबाशी और प्लेट पर रक्खा लड्डू मिलने लगा..

पढाई में ज़रा रूचि कम थी अपनी ,लेकिन जैसे तैसे खींच-खांच के 'फर्स्ट डिविज़न' ले ही आये दसवी बोर्ड में.. लेकिन फिर थोड़े 'कन्फ्युज' हो गए की आगे 'साइंस' चला पाएंगे की नहीं..अंत में थोड़ी हलकी 'कॉमर्स' ले ली..सोचा की चलो थोडा कम बोझ होगा दिमाग पर..

अपनी इसी 'कन्फ्यूजन' के चलते हमने नौकरियां भी बहुत करीं, या फिर ये कहें तो लग भाग सारी ही कर डालीं.. पहले 'पेजर कंपनी' का 'पेजर' बेचा, फिर घर-घर जाके 'सफाई वाली मशीन' फिर किसी दोस्त ने चढ़ाया कि 'तुम्हारी आवाज़ बहुत अच्छी है', तो चले गए 'रेडियो' के लिए विज्ञापन बनाने वाली कंपनी में ऑडिशन देने..किस्मत से हमें ले भी लिया गया..फिर कुछ दिनों बाद दुसरे दोस्तों को देख कर 'कॉल सेंटर' की रंगीनियों की तरफ आकृष्ट हो गए, कुछ दिन बाद फिर मुझे लगा की मै तो पत्रकारिता के लिए ही पैदा हुआ हूँ तो शुरू कर दिया ढेर सारे हिंदी पेपरों में 'पाठकीय' लिखना, 'राष्ट्रीय सहारा' के संपादक एवं मेरे गुरु श्री संजीव मिश्र ने 'सहारा' दिया तो 'सहारा' के लिए 'अनाधिकारिक' 'मुक्त- पत्रकारिता' करने लगा..

'इलेक्ट्रोनिक-मीडिया' से भी तभी जुड़ा, काफी पन्ने भरे मैंने उस दौरान.. लगभग एक वर्ष तक 'क्रांति' करने के बाद जब जोश ठंडा हुआ तो देखा अब तो जितना कमाया था सब खर्चा हो गया इस 'क्रांति' में..फिर बैंक की नौकरी के लिए आवेदन कर दिया..

गरीब के भाग्यवश बैंक ने भी नौकरी दे दी, लेकिन भारत के दुसरे छोर 'गुजरात के कच्छ' में..सौभाग्यवश कुछ स्थानीय रिश्तेदारों ने साहस दिया तो यहाँ आ गया..और लगभग छह वर्षों तक जमके नौकरी की..फिर यहीं पर अपने पारवारिक व्यवसाय में आ गया..

कहतें हैं कि, लिखने और पत्रकारिता का 'कीड़ा' कभी मरता नहीं है, वर्षों बाद फिर जागा और मैं वापस पत्रकारिता में आ गया..लेकिन सं २००० की पत्रकारिता से अब की स्थिति बहुत बदल चुकी है.. अब कलम की वो 'औकात' नहीं, जो कभी हुआ करती थी..काफी कुछ बदल चुका है अब..
क्रांति.कॉम नामक एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ , शायद अपने अंतर्मन के लिए.. जो की आज की 'पत्रकारिता' से दोस्ताना नहीं है .. या फिर 'काबिल' नहीं है ..इसको मैं आजकल की पत्रकारिता को गरियाने से कहीं बेहतर समझता हूँ..क्योंकि मेरी समझ में किसी को भी गरियाने से अच्छा है, उससे दूर से निकल जाना और उसका विकल्प तलाशना..

मुझे लगता है शायद मेरा 'कन्फ्यूजन' का 'शैतान' मर गया है अब..



-प्रशांत गुप्ता .

Saturday, June 19, 2010

..मेरी माँ ..





कभी तपती जैसे सूरज सी, कभी शीतल जैसे चन्दन सी,
कभी सौंधी जैसे मिटटी सी, कभी मीठी जैसे मधुबन सी..


कभी जोर-जोर चिल्लाती थी, कभी लोरी गाके सुलाती थी,
कभी खिलाके सबको घर में, खुद भूखी ही सो जाती थी..


कभी ऊँगली पकड़ के चलाती थी, कभी थपकी देकर सुलाती थी,
कभी जो रूठ जाता था मैं, तो 'टॉफी' देकर मनाती थी..


कभी जो थक जाता था में,तो गोदी में उठाती थी,
कभी न सुन मेरे बहानों को, डांट-डांट नहलाती थी..



कभी लगे जो चोट मुझे, तो अपने आंसू बहाती थी,
कभी खुद सो जाती थी गीले में, मुझको सूखे में सुलाती थी.



कभी कभी अनजाने में, न जाने कौन सा गीत गुनगुनाती थी,
कभी खिलाके 'चुपड़ी' हमें , खुद सूखी रोटी खाती थी..



कभी जो पढ़ता नहीं था मै, 'पापा' का डर दिखलाती थी,
कभी कभी वही फिर 'पापा' से , मेरी शैतानियाँ छुपाती थी..



कभी जो डर जाता था मैं, तो आँचल में छुपलाती थी,
कभी फिर वो खुद ही मुझे, 'चौकलेट' खाने से डराती थी..



माँ रिश्ता एक पूजा है, जो जीवन को सुधराता है,
बड़ा होकर फिर पुत्र वही, निज 'पूजा' में रम जाता है..
मत भूल उसी माँ ने तुझे , छाती से अमृत पिलाया था,
बुरी-बुरी नज़रों से बचा के, काला टीका भी लगाया था.
माँ तुलसी है, माँ चन्दन है, माँ केसर की क्यारी है,
माँ ही हर घरकी शोभा है, माँ हर घर की फुलवारी है..



-प्रशांत गुप्ता

+91-9925143545

Thursday, June 17, 2010

ये कैसा विकास? खाद्य नमक बनता 'सफ़ेद ज़हर'













औद्योगिक विकास रुपी अजगर किस प्रकार से गुजरात की प्राकृतिक संपदा को अपना ग्रास बनाता जा रहा है , इसका जीवंत प्रमाण कच्छ में उत्पादित नमक का औद्योगिक प्रदूषकों एवं रासायनिक कचरे की वजह से की वजह से काला पड़ जाना है,

कच्छ में उत्पादित खाद्य नमक में यहाँ के उद्योगों से निकलने वाला धुवां और औद्योगिक कचरा खाद्य नमक में घुलता जा रहा है,ये कचरा कच्छ में नमक के खेतों के इर्द-गिर्द मौजूद कारखानों की चिमनियों से कार्बन के रूप में खाद्य नमक के ऊपर जमा हो जाता है, जिसको परिष्कृत करने का कोई भी साधन कच्छ में स्थित किसी भी नमक के कारखाने में नहीं है,शोधन करने पर यह नमक काला पड़ जाता है, कई उत्पादक इस नमक को औद्योगिक उपयोग हेतु विभिन्न कंपनियों को बेच देते है हैं, लेकिन वहीँ कुछ कम्पनियाँ बिना इस नमक को शोधित किये हुए, इस प्रदूषित नमक को खाद्य नमक के रूप में देश के विभिन्न बाजारों में भेज देती हैं, जिसकी वजह से हालात बद से बदतर होते चले जा रहे हैं और आम नागरिक अनजाने में ही इस 'सफ़ेद ज़हर' को निगलने पर मजबूर है.




ज्ञात हो की नमक कच्छ के ९०% से ज्यादा नमक भारतीय उत्पादन मानकों का अनुसरण ही नहीं करते हैं, दरअसल नमक के उत्पादन से बिक्री और खपत होने तक ज्यादातर ग्राहक नमक के इस प्रकार प्रदूषित होने की कल्पना भी नहीं कर सकता. नमक विभाग की नीतियाँ भी इतनी लचर हैं की की इस पूरी प्रक्रिया में उत्पादक को कभी भी किसी जांच से नहीं गुजरना पड़ता है. शायद ही देश का कोई स्त्री, पुरुष या बच्चा ऐसा होगा जिसके दैनिक भोजन में नमक न शामिल हो, लेकिन इस नमक के रूप में हम खतरनाक रसायन भी निगल सकते है इसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता है..

गौरतलब है की कच्छ देश के कुल सकल घरेलु नमक उत्पाद का लगभग ६५% नमक का उत्पादन करता है, यहाँ पर छोटी बड़ी मिलकर लगभग ५०० इकाइयाँ हैं जो घरेलु एवं औद्योगिक नमक का उत्पादन करती हैं, कच्छ में सालान लगभग ६०-७० लाख टन नमक का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग ९०% नमक की खपत घरेलु बाज़ार में होती है और बाकि का निर्यात कई खाड़ी देशों एवं सुदूर पूर्वी देशों को किया जाता है.

२००१ में कच्छ में आई भयानक भूकंपीय त्रासदी के बाद सरकार के द्वारा कच्छ की पुनर्स्थापना हेतु उद्योगों को विभिन्न प्रकार की कर-रियायतें दी गयी, जिसके फलस्वरूप अनेकोनेक स्टील एवं बिजली उत्पादक इकाइयाँ यहाँ पर स्थापित हो गयीं.

गांधीधाम चम्बर ऑफ कामर्स के अध्यक्ष 'हीरालाल पारीख का कहना है कि 'सरकार की योजनों के फलस्वरूप एक और जहाँ लगभग २,००,०००  करोड़ का निवेश कच्छ में आया, जो की अपने साथ बहुत सी प्रदूषण जनक इकाइयाँ जैसे स्टील उद्योग, कोयला आधारित उद्योग एवं खाद्य तेल कारखाने भी लाया, जिसका परिणाम कच्छ के स्थानीय नमक उद्योग एवं उससे आश्रित लाखों लोगों को झेलना पड़ रहा है,"
उनका यह भी आरोप है के कच्छ में फिलहाल कुल ३० के करीब स्टील प्लांट मौजूद हैं, जिनको प्रदूषण मानकों के अनुरूप 'ईएसपी चिमनी' लगनी थी लेकिन ज्यादातर ने तो या तो ये 'इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर' इकाइयां लगवाई ही नहीं है , या तो लगवाने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है.

अध्यक्ष का ये भी कहना है कि, इस प्रदुषण के चलते कई नमक के कारखाने बंद हो गए हैं और उन पर आश्रितों के लिए आजीविका की समस्या उत्पन्न हो गयी है, नमक उत्पादकों के साथ स्थानीय कांडला पोर्ट ट्रस्ट का भी सौतेला बर्ताव है, व्यापारियों की मांग है उनको अपने नमक के खेत किसी और जगह पर स्थानांतरित करने के लिए भू-वर्ग दिया जाए, लेकिन उनकी मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

नमक उपायुक्त एम् ऐ अंसारी का कहना है " हम लोग इसकी जांच कर रहे हैं,अगर इस प्रकार का प्रदूषित नमक चमड़ा उद्योगों को बेचा जाता है तो किसी प्रकार का खतरा नहीं है, लेकिन अगर इसका इस्तेमाल खाद्य नमक के रूप में किया जाता है तो हानिकारक हो सकता है "

गुजरात में विकास का दंभ भरने वाली मोदी सरकार एक और जहाँ निवेशकों को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह की 'रेवड़ियाँ ' बाँट रही है, वही दूसरी और इस विकास की कीमत वहां के आम किसानो एवं प्राकृतिक संपदा को चुकानी पड़ रही है. स्थानीय नागरिकों का कहना है कि " इन उद्योगों के आने से फायदा केवल बड़े भू-माफियाओं या सरकार को ही हुआ है, हमारी स्थितियां तो पहले से भी बदतर हो गयीं हैं, स्थानीय कृषि कि हालत खस्ता है, मुन्द्रा एवं आस पास के समुंद्री किनारों पर अदानी उद्योग द्वारा समुन्द्र का अधिग्रहण एवं औद्योगिक कचरे कि वजह से मंग्रोव वन लगभग समाप्ति की कगार पर पहुँच गए हैं, मछलियों कि संख्या भी दिन-पर-दिन कम होती जा रही है जिससे मछुवारों के लिए भी रोजी-रोटी जुटा पाना बहुत कठिन होता जा रहा है, "

-द्वारा

प्रशांत गुप्ता

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Friday, June 4, 2010

सेक्स स्टिंग ऑपरेशन ( न्यूज़ , न्यौता या प्रचार ?)


न्यूज़ चैंनलों की गलाकाट टीआरपी प्रतिस्पर्धा का एक और नया उदाहरण सामने आ रहा है.. समाज में तथाकथित 'सनसनी' फ़ैलाने वाले प्रोग्रामों का स्तर आजकल इतना गिर चुका है की, वे पत्रकारिता की सारी सीमाएं भूल चुकें हैं.. टी आर पी हासिल करने के लिए जब इनके पास कोई खबर नहीं होती है तो निर्देश आता है कि दो-चार 'दलालों' या मसाज पार्लरों का नंबर निकालो अखबार या इन्टरनेट से, और कर डालो एक 'सनसनीखेज़ स्टिंग ऑपरेशन'.. रात को १० बजे के बाद टेलीकास्ट होते, इस तरेह के कार्यक्रमों को एक 'विशेष' दर्शक वर्ग देखता भी बड़े चटखारे लेकर है I धुंधले किये गए चेहरों में शायद लोग पहचानने की कोशिश करते है की शायद कहीं दिख जाये ये लड़की..तो बस ! वहीँ दूसरी ओर बीवी-बच्चों के साथ बैठे हुए 'ज़हीन' दर्शक ऐसी रिपोर्ट आते ही रिमोट ढूंढने लगते हैं ! बातचीत और 'देख-दाख' करने के बात ये पत्रकार न्यूज़ रूम चले आते है एडिटिंग के लिए, कार्यक्रम में भी कथित 'सेक्स के अड्डों ' का लोकेशन वगैरेह बता कर, 'सनसनीखेज' तरीके से कार्यक्रम समाप्त भी हो जाता है I मैं एक बात इनसे पूछना चाहूँगा की इस तरह के 'खुलासों' के पीछे आखिर इनकी मंशा क्या होती है? इस तरह के 'मसाज पार्लरों' एवं 'जिस्मफरोशी के अड्डों' का खुलासा करने के बाद क्या उनको स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना देकर, इन अड्डों को बंद नहीं कराना चाहिए? इस प्रकार से तो इनका राष्ट्रीय चैंनलों पर फ्री फ़ोकट में विज्ञापन हो जाता है, इस तरह के धंधों में लिप्त लोग आजकल तो 'मीडिया प्रूफ' हो गए हैं..अब उन्हें कैमरे का कोई खौफ़ नहीं है, खुले आम अब तो वेबसाइट पर नंबर दिए जाते हैं (जो पहले ई-मेल पते होते थे).

टी आर पी के लिए जिस तरह से पहले INDIA टीवी ११ के बाद पाठकों की अन्तरंग समस्याओं पर चर्चा करता था, अब उसी का रूप १० बजे वाले क्राइम प्रोग्रामों ने ले लिया है.. बीते दिनों मध्य प्रदेश के एक जलसे पर अश्लील नृत्य कि टी आर पी खूब बटोरी गयी थी चैनलों पर.. लेकिन अश्लीलता को अश्लील तरीके से दिखाना क्या अश्लीलता नहीं है? इस तरह कि अश्लीलता से प्रिंट एवं ई मीडिया कोई अछूता नहीं है.. वेब ख़बरों के माध्यम से दुनिया भर को दुनिया भर कि ख़बरें फ्री में दिखाती ख़बरिया वेब साइटें तो आज कल अश्लीलता कि सारी सीमाएं लांघ गयीं हैं, और कमाल की बात ये है की इन वेब साइटों पर कोई लगाम लगाने वाला भी नहीं नहीं है..ज़रा गौर फ़रमायें...http://photogallery.navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5998575.cms?show_recent

मेरा केवल यह सवाल है की अगर मीडिया प्रेस की स्वतंत्रता की बात करता है , तो क्या इस तरह की स्वतंत्रता से समाज का भला होने वाला है? स्व-नियंत्रण संस्था बनने के इतने वर्षो बाद भी कोई असर होता नहीं दिखता है, तो क्यों न हमारे भारत में भी पडोसी देश चीन की तरह ही मीडिया रेगुलेटर बैठा दिया जाये? मै स्वयं एक पत्रकार होने के नाते ये कह रहा हूँ, क्योंकि अब मुझे ऐसा लगता है की इस रोग को रोकने के साथ ही इसको फैलाने वाले 'मरीजों' को भी रोकना होगा. तभी शायद हमारे समाज के चतुर्थ स्तम्भ फिर से समाज को एक मज़बूत आधार दे पायेगा..

-प्रशांत गुप्ता

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Thursday, April 15, 2010

बुरी नज़र वाले , तू पाकिस्तान चला जा ..



नेशनल हाईवे नं १० से जाते हुए इस ट्रक ने अचानक ही हमारा ध्यान खींच लिया, और मैं अपने मोबाईल से इसकी तस्वीर निकाले बिना नहीं रह सका, अक्सर हाईवे पर ट्रकों के पीछे शेर-ओ- शायरी,जुमले इत्यादि लिखे दिख जाते हैं, लेकिन ये जुमला अपने आप में शायद बहुत कुछ कह रहा है, सारे बुरी नज़र वाले जिनका पहले मुह काला किया जाता था, अब उन्हें पकिस्तान जाने की सलाह दी जा रही है, वही पकिस्तान जहाँ हमारे देश की 'सपूतनी' सानिया मिर्ज़ा ब्याही गयीं हैं,इस ट्रक को हैदराबाद से गुज़ारने की ज़रुरत थी कुछ समय पहले. लेखक के मुताबिक शायद मुह काला करने से भी बड़ी सज़ा पकिस्तान भेजना है. ये जुमला हमारे समाज के उस तपके की सोच को दर्शा रहा है , जो हिन्दुस्तान की सरकारें बनाता और बिगाड़ता है, इस ट्रक को हमारे विदेश एवं गृह मंत्रालय के के सामने से भी गुजरने की आवश्यकता थी , जो बिना दांत के शेर की तरह अपनी मांद में बैठ कर केवल गुर्राता आया है पकिस्तान पर, इन सभी 'बुरी नज़र वालों' को पकिस्तान ही भेज देना चाहिए शायद...


कुल मिला के, इस ट्रक को देख कर मेरे मन में इस तरह के कई सवाल उठ गए और पूरे सफ़र भर मैं यही सोचता रहा , कि कितना सही जुमला लिखा है लिखने वाले ने.. अब आप भी सोचिये कि किसने और क्यूँ लिखा ऐसा जुमला..


- प्रशांत गुप्ता

+91-9925143545

Wednesday, April 14, 2010

एक लड़ाई अपनों से ...



लन्दन निवासी प्रवासी भारतीय शिराज़ अन्दानी, गुजरात उच्च न्यायालय के तरफ से आये फैसले से बहुत हर्षित हैं, शिराज़ अन्दानी के खिलाफ स्थानीय पुलिस में उनको प्रताड़ित करने हेतु विभिन्न अपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए थे, लेकिन गुजरात उच्च न्यायालय के हाल ही में आये फैसले ने उनके विरोधियों पर लगाम लगा दी है.



शिराज़ अन्दानी जो की लन्दन निवासी प्रवासी भारतीय हैं और लन्दन में प्राथमिक विद्यालय का सञ्चालन करते हैं एवं मुस्लिम 'खोजा' समुदाय से ताल्लुक रखते हैं , इनके पूर्वज रोज़ी-रोटी कमाने हेतु १९४० में प्रवासी हो गए थे, सं 2001 कच्छ में आई भयानक भूकंपीय त्रासदी में , जब वे कच्छ में आये तो अपने मूल ग्राम में शिक्षा , चिकित्सा एवं मूलभूत सुविधाओं के अभाव को देख कर अत्यंत व्यथित हो गए, तभी उन्होंने मन बनाया की अपनी गाँव के विकास के लिए वह अवश्य कुछ न कुछ ज़रूर करेंगे, इसके बाद वह भविष्य की योजनाओं पर काम करने लगे, इन्ही प्रयासों के चलते वह कई बार भारत अपने गाँव आये, २००७ में स्थानीय निवासियों एवं भारत में अपने अन्य रिश्तेदारों की मदद से उन्होंने स्थानीय ग्राम वासियों को शैक्षिक ट्रस्ट बनाने के लिए उत्साहित किया, क्यूंकि भारतीय ट्रस्ट नियमों के चलते वह स्वयं भारत में ट्रस्ट नहीं बना सकते थे, स्थानीय निवासियों को ट्रस्टी बना कर, गुजरात प्रदेश शैक्षिक बोर्ड से मान्यता हेतु आवेदन कर दिया,



शिराज़ के इस सु-प्रयास को देख कर जहाँ स्थानीय लोगों ने बहुत सहयोग किया वहीँ पर कुछ स्थानीय लोग इर्ष्या एवं द्वेषभाव के चलते इनके विरोधी बन गए, गाँव के ही दुसरे गुट ने इनका मुखर विरोध करना शुरु कर दिया ..उन्होंने गाँव के लोगों को यह कह कर भड़काना चालू कर दिया कि, शिराज़ मुस्लिम हैं और गाँव में मदरसा खोलना चाहते है, गाँव के ही एक दबंग व्यक्ति एवं उनके साथी जो कि अपने निजी लाभ हेतु स्कूल खोलना चाहते थे, उन लोगों ने भी गुजरात माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में हाई स्कूल स्थापना के लिये आवेदन कर दिया, इसके साथ ही शिराज़ को गाँव छोड़ने की धमकियाँ दी जाने लगी,लेकिन शिराज़ अपने दादा के सपने को पूरा करने के लिए अडिग रहे. प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारीयों जब दोनों ही आवेदन कर्ताओं के विद्यालय का निरिक्षण किया, तो वे शिराज़ द्वारा स्थापित स्कूल के सुविधाओं जैसे मुफ्त शिक्षा, स्वच्छ पानी,कंप्यूटर एवं खेल-कूद हेतु तमाम सामग्री इत्यादी को देख कर अत्यंत प्रभवित हो गए और शिराज़ को स्कूल चलने की अनुमति दे दी गयी , जिसके फलस्वरूप इनके विरोधी गुट को मुह की खानी पड़ी.



इस घटना के बाद तो जैसे शिराज़ के बाद एक-के-बाद एक मुसीबतों का अम्बार लग गया, उनके ऊपर ट्रस्ट के मनोनीत सदस्य बनाने के लिए गए दस्तावेजों को फर्जी बता कर अनेक अपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए, शिराज़ ने फिर भी मुक्काद्द्मों एवं प्रताडनाओं की परवाह न करते हुए , गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक से गुहार लगाई,लेकिन मदद तो दूर आश्वासन भी नहीं मिला. हताश निराश शिराज़ ने फिर भारतीय न्याय व्यस्था का सहारा लेते हुए, गुजरात उच्च न्यायालय में अपने खिलाफ झूठे मुक्काद्मों और प्रताडनाओं के विषय में एक याचिका दायर की.



गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अनंत एस दवे ने शिराज़ पर लगे सारे आरोपों को निराधार बताते हुए उनके विरुद्ध दर्ज मुक्काद्द्मों पर अग्रिम आदेश तक रोक लगा दी. इस पर उत्साहित शिराज़ कहते हैं ' शुरुआत में मैं काफी हताश हो गया था, मुझे लगता था मेरा अपना पुश्तैनी गाँव जिसके लोग मेरे अपने ही हैं, उन्ही से मुझे उनकी भलाई के लिए लड़ना पड़ रहा है, लेकिन न्यायालय के फैसले ने मेरा अपने देश की न्याय व्यस्था पर विश्वास अब और बढ़ा दिया है, इस फैसले से मेरी तरह उन सभी प्रवासी भारतियों को साहस मिलेगा जो अपने देश के लिए कुछ करना तो चाहते हैं लेकिन स्थानीय राजनीतियों के कारण या तो कर नहीं पाते या फिर हार कर बैठ जाते है, मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूँ, इतना सब कुछ होने के बाद भी मुझे मेरे विरोधियों से कोई रोष नहीं है, मैं जानता हूँ के वे मेरे उद्देश्यों को समझेंगे और अपने गाँव के विकास में मेरा हाथ बटायेंगे, मैं चाहता हूँ कि, क्यूँ नहीं मेरे अपने गाँव से भी कोई 'श्याम पित्रोदा' बने और हमारे गाँव और देश का नाम रौशन करे"



शिराज़ ने हमें विद्यालय देखने के लिए आमंत्रित किया, बाहर से विद्यालय आम विद्यालयों के तरह ही लगा, लेकिन जब हम अन्दर गए तो इतनी छोटे से गाँव में इतनी सुविधाओं वाला विद्यालय देख हमें थोड़ा आश्चर्य हुआ, बच्चों से बात किया तो पता चला, इस छोटी सी आबादी वाला गाँव जिसकी ७० प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, उस गाँव के बच्चों ने हमसे 'अंग्रेजी' में बात करी, जो कि विन्डोज़ के नवीन संकरण से सु-सज्जित कप्युटरों पर काम करते हैं. साफ़ कक्षाएं और प्रसाधन, एक बेसबाल और वौलिबौल कोर्ट भी देखने को मिला. अद्ध्यापक एवं अद्ध्यापिकाएं भी प्रशिक्षित लगे.



शिराज़ द्वारा प्रेरित एवं गठित 'अन्दानी फाऊँडेशन ट्रस्ट' कि भविष्य कि योजनाओं में, 'वंडिया' गाँव में चिकित्सा एवं सामाजिक उत्थान हेतु विब्भिन्न योजनायें चलाने की है, जिनकी रूप रेखा तैयार की जा चुकी है.


- प्रशांत गुप्ता

+91-9925143545

Wednesday, April 7, 2010

मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी ..


मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी .. मैं कौन हूँ, अबला नारी सी..

मैं कौन हूँ , जिसने जन्म दिया तुम सबको को अपने आँचल में..

मैं कौन हूँ, जिसने सींचा है तुमको हरपल में I

मैं कौन हो जिसको नहीं पता, बच्चे उसके गोरे है या काले है..

मैं कौन हूँ जिसको नहीं पता कितने मेरे पाँव में छाले हैं I

मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी .. मैं कौन हूँ, अबला नारी सी..

मैं कौन हूँ, जो नहीं है सोती रातों को,

मैं कौन हूँ, जो देती है छतरी, रूकती चलती बरसातों को I

मैं कौन हूँ, जो देती है रोटी , अपने हर भूखे बच्चे को ..

मैं कौन हूँ, जिसने प्यार दिया हर झूठे या फिर सच्चे को I

मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी .. मैं कौन हूँ, अबला नारी सी..

मैं कौन हूँ , जो डर जाती है, अपने बच्चों से कभी कभी..

मैं कौन हूँ , जो रो जाती है , अपने बचों से कभी कभी I

मैं कौन हूँ, जो अपने बच्चों को देख-देख मुस्काती है,

मैं कौन हूँ, जो हर छोटे धमाकों से डर जाती है I

मैं कौन हूँ , एक लाचारी सी .. मैं कौन हूँ, अबला नारी सी..

मैं कौन हूँ, जिसका की कोई धर्म नहीं,

मैं कौन हूँ , जिसके बच्चों में शर्म नहीं I

मैं कौन हूँ, जिसके बच्चे, खुद मेरे लिए ही लड़ते हैं,

मैं कौन हूँ जिसके बच्चे, भाषा,क्षेत्र पर मरते है..

मैं माँ हूँ ,हर उस बच्चे की जो मेरे आँचल में सोता है,

मैं माँ हूँ , हर उस बच्चे की जो भूख से व्याकुल रोता है.

कुछ मान करो कुछ शर्म करो मुझ बेबस अबला माँ की भी,

ज़रा फिक्र करो ज़रा सोचो तो , हर जाती हुई जान की भी..

मैं कौन हूँ? मैं तो माँ हूँ ..मैं 'मुंबई' हूँ..





-प्रशांत गुप्ता

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वो छोटी छोटी बातों पर...


वो छोटी छोटी बातों पर , झट से लड़ जाना याद है क्या..
वो लम्बी लम्बी मांगो को, रो कर मनवाना याद है क्या..

वो उड़ाना ऊंची पतंगों को, फिर भागना मीलों पकड़ने को..
वो मेरे सारे कंचों को , लेकर गुम जाना याद है क्या.

वो छोटी छोटी....


वो हर सुबह पेट दर्द , रोना और चिल्लाना ,
वो हर दिन नया बहाना, मम्मी को सुनाना याद है क्या..

वो छोटी छोटी..


वो करना झगड़ा दोस्तों से , वो मारना पत्थर शीशों पे,
वो आना लोगों का घर पर, झट से छुप जाना याद है क्या ..


वो छोटी छोटी..

वो चुपके से साइकिल ले जाना, गिर गिर कर भी चलाना
वो बाजू वाले के डोर बेल को, बजा कर छुप जाना याद है क्या .

वो छोटी छोटी बातों पर , झट से लड़ जाना याद है क्या..
वो लम्बी लम्बी मांगो को, रो कर मनवाना याद है क्या..



-प्रशांत गुप्ता

www.krantee.com

जीवन में यूँ ही कभी-कभी..


जीवन मैं यूँही कभी कभी , कुछ ऐसे पल भी आते हैं,
होकर विचलित हम सपनो में, बैठे बैठे खो जाते हैं...

मन निष्चल सा निर्जीवन सा , क्षीण क्षीण हो जाता है.
कुछ उजली-धुंधली यादों मैं , न जाने क्यूँ खो जाता है..

क्यूँकर मन रिझ जाता है, फिर से उन तृष्णाओं में?
खुशबु क्यूँ आने लगती है , तुम्हारी, इन हवाओं में...

शब्दों के तक्षक बंधन में, जीवन भला बंधा है कभी,
दिशाहीन धनुर्धर से , कोई तीर भला सधा है कभी ?

क्या पाया था इस जीवन में, जो सोच सोच मन रोता है,
पाने खोने की मृगतृष्णा में, फिर क्यूँ व्यथित तू होता है..

अंतहीन आकाश से जैसे, पक्षी प्रतियोग सा करता है,
स्व्यम्जनित अहम से मन, वैसे ही प्रयोग सा करता है...

जीवन की इस धरा में, बहते रहना ही जाना है,
जो बीत गया वो बीत गया, न सोच समय गंवाना है...

चलते चलते हर राह में पथिक, कांटे कंकड़ तो आयेंगे,
हर घाव जो देंगे अपने, तुम्हे, चलते-चलते भर जायेंगे...

ज्यौं रुक गया मैं थक हार कर, अंतर भी मेरा मर जाएगा,
रुक-रुक कर विचरित करने से, जीना नश्वर हो जाएगा...!


- प्रशांत गुप्ता

+91-9925143545